भूत बंगला बन गया है अल्पसंख्यक छात्रावास

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महिला कॉलेज में जिले के विभिन्न स्थानों के कम से कम तीन हजार छात्राएं पढ़ती हैं, लेकिन कॉलेज प्रशासन का कहना है कि छात्राएं वहां रहना ही नहीं चाहती हैं, अल्पसंख्यक छात्राओं की संख्या कम होने की वजह से यह समस्या उत्पन्न हो रही है. कटिहार : शहर के एमजेएम महिला कॉलेज अल्पसंख्यक बालिका छात्रावास […]

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महिला कॉलेज में जिले के विभिन्न स्थानों के कम से कम तीन हजार छात्राएं पढ़ती हैं, लेकिन कॉलेज प्रशासन का कहना है कि छात्राएं वहां रहना ही नहीं चाहती हैं, अल्पसंख्यक छात्राओं की संख्या कम होने की वजह से यह समस्या उत्पन्न हो रही है.

कटिहार : शहर के एमजेएम महिला कॉलेज अल्पसंख्यक बालिका छात्रावास से जिले के अल्पसंख्यक छात्राओं को किसी तरह का कोई लाभ नहीं मिल रहा है. लाखों की लागत से बना छात्रावास भूत बंगला बनकर रह गया है. यह छात्रावास अपने अच्छे दिनों के इंतजार की बाट जोह रहा है. बिहार सरकार के अल्पसंख्यक मद से निर्मित जिले का पहला बालिका छात्रावास तीन वर्षों से उपेक्षित पड़ा हुआ है. छात्रावास के मकान की खिड़कियों व दीवारों पर घास फूस एवं जंगली पेड़ पौधे उग आये हैं.
इसके सही रख-रखाव की ओर न ही कॉलेज प्रशासन का ही ध्यान जाता है न ही अल्पसंख्यक जिला प्रशासन द्वारा ही कोई पुख्ता कदम उठाया जा रहा है. 80 सीटों का यह छात्रावास सालों से खाली पड़ा है.
छात्रावास में रहना नहीं चाहती हैं छात्राएं : महिला कॉलेज में जिले के विभिन्न स्थानों के कम से कम तीन हजार छात्राएं पढ़ती हैं. लेकिन कॉलेज प्रशासन का कहना है कि छात्राएं वहां रहना ही नहीं चाहती हैं.
अल्पसंख्यक छात्राओं की संख्या कम होने की वजह से यह समस्या उत्पन्न हो रही है. कॉलेज प्रशासन का यह भी कहना है कि यदि सभी समुदाय के छात्राओं के रहने की इजाजत होती तो निश्चित रूप से वहां छात्राएं रहती लेकिन ऐसा नहीं होने के कारण अल्पसंख्यक छात्राएं यहां रहने से परहेज करती है. ऐसे में बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि आखिर इतनी बड़ी लागत से अल्पसंख्यक छात्रावास का निर्माण कराया गया. जो सफेद हाथी बनकर रह गया है. क्यों नहीं अल्पसंख्यक छात्राओं को यहां रहकर पढ़ाई करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है.
कहती हैं प्राचार्य
एमजेएम महिला कॉलेज के प्राचार्या डॉ चंदना झा ने बताया की प्रत्येक वर्ष अल्पसंख्यक छात्राओं का नामांकन और वर्गों की अपेक्षा बहुत कम होती है. उसमें भी नामांकित छात्रों में से छात्रावास में रहने वाली छात्रों की संख्या 5 से 6 होते है. जो की 80 सीटों वाला छात्रावास की तुलना में बहुत ही कम है. इतने कम छात्रा को छात्रावास में रखना बहुत ही मुश्किल है. क्योंकि छात्राओं के खाने के पैसे से ही रसोइया को प्रत्येक माह पैसे दिये जायेंगे. साथ ही साथ कम छात्राओं को रखने से उन्हें सुरक्षा देने में भी मुश्किले आयेंगी. प्राचार्या ने कहा की इसके लिए जिले के सभी कॉलेजों को सूचित भी किया गया है कि कोई भी छात्रा जिले के किसी भी कॉलेजों में नामांकित हो वे छात्रावास में रहने के लिए आवेदन कर सकते है.
परंतु प्रत्येक वर्ष छात्रों की संख्या कम होने की वजह से छात्रावास को नहीं खोला जा सका है. प्राचार्या ने अपना सुझाव जिला अल्पसंख्यक पदाधिकारी को भी दी है. अल्पसंख्यकों को प्राथमिकता देते हुए और भी वर्गों को छात्रावास में रखने की अनुमति दी जाय. लेकिन जिला अल्पसंख्यक पदाधिकारी ने कहा की छात्रावास अल्पसंख्यक मद से निर्मित है. इसलिए केवल अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों को ही रखा जायेगा.
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