70 फीसदी तालाब सूखे पर्यावरण दिवस . रोक के बावजूद पॉलीथिन का हो रहा उपयोग
Edited by Prabhat Khabar Digital Desk
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पर्यावरण संरक्षण नहीं होने की वजह से जिले के कई बड़े तालाब व नदियों पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ा है. पर्यावरण प्रदूषण की वजह से बढ़ती तपिश व गरमी ने पानी के स्तर को काफी नीचे कर दिया है. कटिहार : बदलती जीवन शैली व तथाकथित विकास मॉडल की वजह से आज वैश्विक स्तर पर […]
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पर्यावरण संरक्षण नहीं होने की वजह से जिले के कई बड़े तालाब व नदियों पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ा है. पर्यावरण प्रदूषण की वजह से बढ़ती तपिश व गरमी ने पानी के स्तर को काफी नीचे कर दिया है.
कटिहार : बदलती जीवन शैली व तथाकथित विकास मॉडल की वजह से आज वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संकट एक गंभीर चुनौती बन गया है. आज (पांच जून) विश्व पर्यावरण दिवस है. इस दिवस पर प्रदेश व देश के स्तर पर विभिन्न आयोजन के जरिये पर्यावरण संरक्षण की अपील की जाती है तथा संकल्प भी दोहराया जाता है. पर, उपभोक्तावादी संस्कृति का पर्यावरण संकट को बढ़ाने में बड़ी भूमिका है.
पॉलीथिन का हो रहा है धड़ल्ले से उपयोग : जिले के शहरी क्षेत्र में पॉलीथीन के रोक के बावजूद धड़ल्ले से इसका उपयोग किया जा रहा है. पर्यावरण प्रदूषण बढ़ाने में पॉलीथिन का बहुत बड़ा योगदान है. मिट्टी को प्रदूषित करने के साथ-साथ पॉलीथिन कई तरह से पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है. पर्यावरण संकट का प्रमुख कारण पॉलीथिन के होने के वजह से ही इस पर दो साल पूर्व नगर निगम प्रशासन ने रोक लगायी थी. कुछ माह तक पॉलीथिन का उपयोग बंद जरूर हुआ, लेकिन प्रशासनिक निगरानी नहीं होने की वजह से इन दिनों धड़ल्ले से पॉलीथिन का उपयोग किया जा रहा है.
सरकारी नीितयों भी जिम्मेवार
समाज व शासन-प्रशासन पर्यावरण संकट के लिए खास तरह से दोषी है. एक तरफ लोगों की जीवन शैली की वजह से पर्यावरण में असंतुलन पैदा होने लगा है, तो दूसरी तरफ सरकार की नीतियां भी पर्यावरण संकट के लिए जिम्मेदार हैं. अगर समय रहते पर्यावरण संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाये गये, तो आने वाले समय में गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे.
डॉ टीएन तारक, पर्यावरणविद्
जलस्तर लगातार जा रहा नीचे
पर्यावरण प्रदूषण की वजह से बढ़ती तपिश व गरमी ने पानी के स्तर को काफी नीचे कर दिया है. स्थानीय विभागीय आंकड़ों पर भरोसा करें, तो जिले के 70 फीसदी से अधिक छोटे-बड़े तालाब पूरी तरह सूख गये हैं. नदी तालाब के सूखने से मनुष्यों सहित जीव-जन्तुओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. नदी तालाब के सूखने से खासकर जलीय जीव व पौधाें पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है. संरक्षण के अभाव में कई जलीय जीव विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुके हैं.
मात्र 10 फीसदी ही जिले में वन क्षेत्र
पर्यावरण को बचाने का एक प्रमुख साधन पेड़-पौधे ही हैं. कटिहार जिले में पेड़-पौधे अत्यधिक नहीं होने की वजह से पर्यावरण संकट बढ़ा है. जानकारों की मानें, तो जिले के पूरे भू-भाग में से एक तिहाई क्षेत्र में पेड़-पौधे होने चाहिये, लेकिन मात्र 10 फीसदी भू-भाग पर ही पेड़ पौधे लगे हुए हैं. दरअसल जिस रफ्तार से पेड़-पौधों की कटाई हो रही है, उसके अनुरूप पौधारोपण नहीं किया जाता है. इससे पर्यावरण असंतुलन की स्थिति बन गयी है.
खासकर उपभोक्तावादी संस्कृति की वजह से लोग पर्यावरण के प्रति उदासीन बने हुए हैं. बढ़ती आबादी की तुलना में जितने पेड़-पौधों की जरूरत प्राकृतिक संतुलन बनाये रखने के लिए जरूरी है, उसके हिसाब से जिले में पेड़-पौधे की भारी कमी है.
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