कटिहार-बरौनी पैसेंजर ट्रेन के शौचालय को रेल प्रशासन ने कर दिया है सील, यात्री परेशान

Updated at : 11 Jun 2019 7:37 AM (IST)
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कटिहार-बरौनी पैसेंजर ट्रेन के शौचालय को रेल प्रशासन ने कर दिया है सील, यात्री परेशान

कटिहार : कटिहार-बरौनी इएमयू ट्रेन में यात्रियों के लिए शौचालय का उपयोग करने पर रोक लगा दी गयी है. इससे यात्रियों को परेशानी का समाना करना पड़ रहा है. यह स्थिति नवंबर 2018 से बनी हुई है. ट्रेन में 14 कोच है. सभी कोच के शौचालय कक्ष को रेल प्रशासन ने सील कर दिया है. […]

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कटिहार : कटिहार-बरौनी इएमयू ट्रेन में यात्रियों के लिए शौचालय का उपयोग करने पर रोक लगा दी गयी है. इससे यात्रियों को परेशानी का समाना करना पड़ रहा है. यह स्थिति नवंबर 2018 से बनी हुई है. ट्रेन में 14 कोच है. सभी कोच के शौचालय कक्ष को रेल प्रशासन ने सील कर दिया है. इसके कारण यात्री शौचालय का उपयोग करने से वंचित रह जाते हैं. ट्रेन को कटिहार से बरौनी पहुंचने में 5:30 घंटा लगता है.

बरौनी से कटिहार आने में भी साढ़े पांच घंटे का समय लगता है. ट्रेन कटिहार से खुलकर सेमापुर, काढ़ागोला, बखरी, कुरसेला, कटरिया, बानिकपुर, नवगछिया, खरीक, बारीग्राम हॉल्ट, थाना बिहपुर, नारायणपुर, भरतखंड, पसराहा, गौछारी, महेशखूंट, छीधा वानी, मानसी, खगड़िया, उमेश नगर, साहेबपुर कमाल, लखमीनिया, घनौली, लाखों, बेगूसराय, तिलरथ होते हुए बरौनी को जाती है.
स्वच्छता अभियान की निकल रही हवा: एक तरफ भारत सरकार स्वच्छता अभियान चला रही है. दूसरी तरफ रेल मंत्रालय के द्वारा ट्रेन के शौचालय कक्ष को सील कर दिया है. आखिर रेल मंत्रालय के द्वारा किस परिस्थिति में ऐसा निर्णय लिया गया, यह सार्वजनिक नहीं किया गया है. यह ट्रेन दानापुर रेल मंडल के द्वारा नवंबर 2018 से परिचालन किया जाता है. तब से ट्रेन में पानी की व्यवस्था नहीं है. शौचालय एवं यूरिनल का भी व्यवस्था नहीं है.
ट्रेन में शौचालय के लिए ब्रिटिश शासन काल में भागलपुर रेल खंड में उठी थी आवाज : भारत में पहली ट्रेन चलने के 55 साल बाद ट्रेनों में शौचालय की सुविधा उपलब्ध कराया गया. ब्रिटिश शासन के दौरान ट्रेनों में शौचालय के लिए एक भारतीय ने भागलपुर रेलखंड से आवाज उठाई थी.
अंग्रेजों ने ट्रेनों में शौचालय की व्यवस्था एक यात्री के पीड़ा भरे पत्र मिलने के बाद की थी. यह पत्र भागलपुर रेलखंड के यात्री ट्रेन से यात्रा कर रहे ओखिल चन्द्र सेन ने 1909 में लिखी थी. जो भारतीय रेल में इतिहास बन गया. यह पत्र आज भी दिल्ली के रेलवे म्यूजियम में चस्पा है.
ओखिल बाबू के बारे में मिली सूचना के आधार पर वह एक बैंक अधिकारी थे. उन्होंने यह पत्र उस वक्त के साहिबगंज रेलवे डिविजन आफिस को लिखी थी. उनकी चिट्ठी के बाद ही ब्रिटिश शासन के दौरान ट्रेनों में शौचायल का प्रस्ताव आया. इसकी चर्चा आईआईएम अहमदाबाद में शोधार्थी जी रघुराम ने प्रकाशित शोध पत्र में भी की है. भारत में सबसे पहली ट्रेन 1853 में चलायी गई थी. इसके लगभग एक दशक बाद ही हावड़ा जमालपुर होते हुए लूप लाइन का निर्माण हुआ था और उस वक्त कोई एक्सप्रेस ट्रेन नहीं चलती थी.
महिला यात्रियों का सफर कष्टकारी
सभी रेलवे स्टेशन पर बड़ी संख्या में इस ट्रेन में यात्री सवार होते हैं. अधिकांश यात्री कटिहार से बरौनी जाने के लिए यात्रा करते हैं. यात्रा अवधि में बच्चे, महिलाएं एवं पुरुष यात्रियों को शौच की जरूरत पड़ता है. लेकिन ट्रेन में शौचालय रहते हुए भी उपयोग नहीं कर पाते हैं. खासकर वृद्ध, बीमार यात्री को हमेशा शौच के लिए जाना पड़ता है. ऐसी स्थिति में यात्रियों को काफी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है. यात्रियों के बार-बार शिकायत करने के वावजूद भी शौचालय को चालू नहीं किया गया है.
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