निजी स्कूलों में सीबीएसइ करिकुलम प्रकाशक की मर्जी की चलती हैं किताबें
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :02 Apr 2019 6:38 AM (IST)
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कटिहार : हर साल की तरह इस बार भी अप्रैल शुरू होते ही निजी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे के अभिभावकों का हाथ-पांव फूलने लगे हैं. खासकर सीबीएसइ से गैर संबद्धता प्राप्त जिले के शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में निजी विद्यालय कि मनमानी पर अब तक कोई रोक नहीं लगी है. फलस्वरुप अभिभावक निजी विद्यालय […]
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कटिहार : हर साल की तरह इस बार भी अप्रैल शुरू होते ही निजी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे के अभिभावकों का हाथ-पांव फूलने लगे हैं. खासकर सीबीएसइ से गैर संबद्धता प्राप्त जिले के शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में निजी विद्यालय कि मनमानी पर अब तक कोई रोक नहीं लगी है. फलस्वरुप अभिभावक निजी विद्यालय की मनमानी का शिकार बन रहे हैं. जिला शिक्षा विभाग पूरी तरह उदासीन बना हुआ है.
री-एडमिशन, पाठ्यपुस्तक सहित पठन-पाठन से जुड़े अन्य सामग्री की खरीदारी विद्यालय प्रबंधन की मर्जी से होने की वजह से अभिभावक परेशान है.
भीतर ही भीतर अभिभावक में आक्रोश भी पनप रहा है. पर कहीं से कोई न्याय नहीं मिलता देख विद्यालय प्रबंधन के अत्याचार को सहन करने को मजबूर है. इस बीच यह भी चर्चा होने लगी है कि अधिकांश निजी विद्यालय केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के करिकुलम के आधार पर शिक्षा व्यवस्था देने का दावा करती है.
इस आशय से संबंधित जिक्र भी संबंधित निजी विद्यालय के बोर्ड पर रहता है. पर इसका अनुपालन निजी विद्यालय नहीं करते हैं. शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी चर्चा है कि विभिन्न तरह के प्रकाशक के मनमर्जी पर ही विद्यालय प्रबंधन पाठ्यपुस्तक चयन करते है. अप्रैल शुरू होने के साथ ही नया शैक्षणिक सत्र प्रारंभ हो जाता है. स्कूल प्रबंधन नये सत्र के प्रारंभ होने पर अभिभावकों को लंबी सूची थमा रहे है.
नर्सरी से लेकर दसवीं व बारहवीं तक के बच्चों को पढ़ाने के नाम पर जिस तरह निजी विद्यालय अलग-अलग मद में सूची अभिभावकों को थमा रहे है. वह परेशानी में डालने वाला है.
अब तो स्कूल प्रबंधन ने पठन-पाठन सहित अन्य जरूरी सामग्री उनके दिशा निर्देश पर ही लेने के लिए अभिभावको बाध्य कर रहे हैं. इस बीच दर्जनों प्रकाशक अपने यहां के पाठ्य पुस्तक लागू करने के लिए विभिन्न निजी विद्यालय के निदेशक, संचालक एवं प्राचार्य को लुभाने में जुटे हुए हैं.
जानकारी के अनुसार पुस्तक चलाने के नाम पर प्रकाशक द्वारा विद्यालय प्रबंधन को कमीशन के नाम पर मोटी रकम उपलब्ध कराया जाता है. कमीशन के आधार पर ही विद्यालय प्रबंधन यह तय करता है कि कौन सा प्रकाशक का पुस्तक उनके विद्यालय में चलेगा.
इसी तरह विभिन्न तरह के मद में भी अलग-अलग विद्यालय अपने हिसाब से फीस निर्धारित करती है. निजी विद्यालय के मनमानी पर रोक को लेकर न तो प्रशासनिक स्तर पर कोई पहल होती है और न ही जनप्रतिनिधि ही इस दिशा में कोई पहल करते हैं.
पाठ्यपुस्तक खरीदने में लग रही है मोटी रकम. यह सर्व विदित है कि निजी विद्यालय यूं तो अलग-अलग फीस के नाम से अभिभावकों का आर्थिक दोहन तो करता ही है. सर्वाधिक दोहन पाठ्यपुस्तक के नाम पर होता है.
दर्जनों प्रकाशक इन दिनों शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों के विभिन्न निजी विद्यालयों में जाकर विद्यालय के निदेशक, संचालक व प्राचार्य को लुभाने की कोशिश में जुटे हैं. विद्यालय प्रबंधन को प्रकाशक की ओर से उनके पुस्तक लागू करने के नाम पर मोटी कमीशन का ऑफर भी दिया जा रहा है.
एक निजी विद्यालय के संचालक ने नाम नहीं छापने के शर्त पर बताया कि पुस्तक चलाने के लिए प्रकाशक की ओर से 20 से 40 प्रतिशत तक का कमीशन दिया जाता है. दूसरी तरफ नर्सरी से लेकर 10-12वीं कक्षा के छात्र छात्राओं को पाठ्य पुस्तक के लिए 1000 से 4000 रुपया तक चुकाना पड़ रहा है.
अभिभावकों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि विद्यालय प्रबंधन अपने यहां से ही पुस्तक सप्लाई करते हैं. जिन निजी विद्यालय के पास पाठ्यपुस्तक सप्लाई करने की व्यवस्था नहीं है. उनके द्वारा निर्धारित पुस्तक दुकान से पुस्तक लेने की हिदायत दी जाती है. मजबूरी में बच्चों के भविष्य का ख्याल करके निर्धारित पुस्तक दुकान से ही पुस्तक लेनी पड़ रही है.
केस स्टडी-वन
सीबीएसइ से गैर संबद्धता प्राप्त निजी विद्यालय में अपने बच्चों को पढ़ाने वाले एक अभिभावक पंकज कुमार मंडल ने सोमवार को प्रभात खबर से बातचीत में कहा कि जिस तरह निजी विद्यालय को विभिन्न तरह के फीस लेकर शिक्षा के नाम पर लूट की छूट दी गयी है. वह वर्तमान व्यवस्था की पोल खोलती है. कहीं कोई निगरानी नहीं है. बेखौफ होकर निजी विद्यालय अभिभावकों का आर्थिक दोहन करने में जुटे हैं.
सीबीएसइ निजी विद्यालय को पाठ्यपुस्तक संचालन को लेकर दिशानिर्देश जारी किया है, पर सीबीएसइ करिकुलम आधार पर शिक्षा देने वाली बड़ी तादाद में स्थापित निजी विद्यालय ने अपने मनमाफिक पाठ्यपुस्तक लागू करने में विश्वास रखती है.
यही वजह है कि बगैर संबद्धता प्राप्त निजी विद्यालय मानक नहीं रहने की वजह से अपने मनोनुकूल पाठ्यपुस्तक बच्चों को पढ़ने के लिए विवश कर रहे हैं.
केस स्टडी-टू
मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 जब लागू हुई. तब इसमें निजी विद्यालय की स्थापना को लेकर कई तरह के जरूरी प्रावधान किये गये. पर इसका अनुपालन भी नहीं हो रहा है.
यद्यपि राज्य सरकार ने निजी विद्यालयों की स्थापना को लेकर गाइडलाइन जारी की है. पर विभागीय गाइडलाइन फाइलों तक ही सीमित है. कैसे विद्यालय की स्थापना की जाती है.
स्थापना करने वाले कौन लोग हैं. उनकी शैक्षणिक योग्यता क्या है. बच्चों को लेकर उनकी भावना किया है. आधारभूत संरचना किया है. नियमावली के तहत विद्यालय स्थापित की गयी है या नहीं आदि कई ऐसे बिंदु है. जिस पर विभाग को जानकारी लेना चाहिए.
स्थानीय शिक्षा विभाग इस बारे में बिल्कुल मौन दिख रही है. विभागीय सूत्रों की माने तो शायद ही कभी शिक्षा विभाग के अधिकारी निजी विद्यालय का निरीक्षण करते हैं. ऐसे में साफ जाहिर होता है कि सरकारी विभाग इस मामले में किस हद तक उदासीन है.
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