भभुआ में गहराया नशे का जाल : शराबबंदी के बाद ''सूखे नशे'' की चपेट में युवा पीढ़ी

शराब का विकल्प बने हेरोइन व घातक इंजेक्शन, असमय मौत के आगोश में समा रहे किशोर.
= गांजा, हेरोइन व भांग के अलावा तलब मिटाने के लिए कर रहे नशीले सुई का भी प्रयोग शराब का विकल्प बने हेरोइन व घातक इंजेक्शन, असमय मौत के आगोश में समा रहे किशोर. अपराध की दुनिया में बढ़ती नाबालिगों की तादाद, समाजशास्त्री व मनोवैज्ञानिकों ने जतायी गहरी चिंता. भभुआ सदर. बिहार में शराबबंदी लागू हुए पांच साल से अधिक का समय बीत चुका है. जिले के शहरी व देहाती इलाकों में शराब का शोर भले ही मद्धिम पड़ा हो, लेकिन नशे का बदलता स्वरूप अब बड़ी चिंता बन गया है. शराबबंदी के बाद विकल्प के तौर पर नशे के आदि लोग व नाबालिग बच्चे अब हेरोइन, गांजा, व्हाइटनर, सनफिक्स व फोर्टबीन सूई आदि का उपयोग कर रहे हैं. इस सूखे नशे के सबसे अधिक शिकार युवा व किशोर हो रहे हैं, जिससे उनके परिजन बेहद परेशान हैं. शराब से कहीं ज्यादा घातक इस लत की जद में आ चुके किशोर सड़कों पर चलते-फिरते देखे जा सकते हैं. इसी नशे के कारण अब युवाओं की असमय मौत भी होने लगी है. रविवार को सोनहन थानाक्षेत्र के पंची गांव के समीप एक ऑटो से दो युवकों के शव मिले, जिनके पास से पुलिस ने हेरोइन की पुड़िया व इंजेक्शन बरामद किये. अंदेशा है कि नशे के अत्यधिक सेवन से ही दोनों की मौत हुई है. हालांकि, मौत की आधिकारिक पुष्टि के लिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है. चोरी व छिनतई में नशेड़ी युवाओं की भागीदारी बनी बड़ी चुनौती जिले के भभुआ व मोहनिया जैसे शहरों में बाइक व मोबाइल चोरी से लेकर हिंसा जैसे संगीन मामलों में नाबालिगों की बढ़ती तादाद सभ्य समाज के लिए खतरे की घंटी है. पटेल कॉलेज के प्रोफेसर जगजीत सिंह के अनुसार, पारिवारिक देखभाल की कमी व नैतिक शिक्षा के अभाव में बच्चे नशे व अपराध की ओर कदम बढ़ा रहे हैं. इससे उनमें आक्रामकता की प्रवृत्ति भी बढ़ी है. समाजसेवी अजय सिंह ने कहा कि जिन कंधों पर देश की बागडोर है, उनका आपराधिक वारदातों में संलिप्त होना गंभीर है. ऐसे में अभिभावकों को अपने बच्चों के रहन-सहन व मित्रों की जानकारी रखना बेहद जरूरी हो गया है. भटकाव के पीछे उपभोक्तावाद व हार्मोनल बदलाव भी जिम्मेदार युवाओं के भटकने के पीछे मोबाइल, फिल्में व शॉर्टकट में पैसा कमाने की लालसा प्रमुख कारण हैं. मनोवैज्ञानिक भावना गुप्ता के अनुसार, आज की चमक-दमक वाली संस्कृति नैतिक मूल्यों पर हावी हो रही है. जब बच्चों की मांगें पूरी नहीं होतीं, तो वे गुमराह होकर अपराध की राह पकड़ लेते हैं. इसके साथ ही समय से पूर्व शारीरिक विकास व हार्मोन की अधिक सक्रियता भी बच्चों को आक्रामक बना रही है. यह स्थिति अभिभावकों व समाजशास्त्रियों के लिए मंथन का विषय बन गयी है.
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