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JP JAYANTI: जब जेपी के हौसले के आगे कमजोर पड़ गई थी ब्रिटिश हुकूमत की सलाखें, पढ़े पूरी STORY

Updated at : 08 Oct 2022 4:11 AM (IST)
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JP JAYANTI: जब जेपी के हौसले के आगे कमजोर पड़ गई थी ब्रिटिश हुकूमत की सलाखें, पढ़े पूरी STORY

Jai Prakash jayanti: 11 अक्टूबर 1902 को बिहार के सिताब दियारा के एक चित्रगुप्तवंशी कायस्थ परिवार में जयप्रकाश नारायण (जेपी) का जन्म हुआ था. उन्होंने विद्यार्थी जीवन से ही स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया था.

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Jai Prakash Narayan JAYANTI: जयप्रकाश नारायण जिसे हम जेपी के नाम से जानते है. यह वो नाम है जिसने 1970 में इंदिरा गांधी के विरुद्ध विपक्ष का नेतृत्व किया था. यह वो नाम है जिसके आंदोलन के बाद कभी देश की आयरन लेडी के नाम से मशहूर इंदिरा गांधी की सत्ता डगमगा गई थी. जेपी न केवल के भारतीय राजनेता बल्कि एक सच्चे समाज सेवक थे. जिन्हें हम लोकनायक के नाम से भी जानते हैं.

1998 में मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया

साल 1998 में भारत सरकार ने जेपी को मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न से नवाजा था. इसके अलावे जेपी को समाजसेवा के लिए मैगससे पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है. यह जेपी के सर्वोच्च सेवा भाव का ही नतीजा है कि दिल्ली के सबसे बड़े अस्पताल ‘लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल’ का नाम उनके नाम पर है. इसके अलावे पटना के हवाई अड्डे का नाम भी लोकनायक जयप्रकाश के नाम से जाना जाता है.

कायस्थ परिवार में हुआ था जन्म

जेपी की जीवनी की बात करें तो उनका जन्म बिहार के सिताब दियारा में 11 अक्टूबर 1902 को एक चित्रगुप्तवंशी कायस्थ परिवार में हुआ था. इनका विवाह अक्टूबर 1920 में प्रभावती के साथ हुआ था. अमेरिका से लौटने के बाद जेपी का संपर्क गांधी जी के साथ काम कर रहे जवाहर लाल नेहरु से हुआ था. साल 1932 में गांधी, नेहरु और अन्य महत्त्वपूर्ण कांग्रेसी नेताओं के जेल जाने के बाद जेपी ने भारत के अलग-अलग हिस्सों में स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया था.

सितम्बर 1932 में अंग्रेजी हुकूमत ने किया था गिरफ्तार

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बनने पर जेपी अंग्रेजी हुकूमत की आंखों में कांटों की तरह खटक रहे थे. भारत में अलग-अलग हिस्सों में संग्राम का नेतृत्व करने के बाद अंतत: बिट्रिश हुकूमत ने मद्रास से जेपी को सितम्बर 1932 में गिरफ्तार कर नासिक जेल भेज दिया था. जेपी ने यहां भी हार नहीं मानी जेल में भी उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के मशाल को जलाये रखा, जेल में जेपी की मुलाकात मीनू मसानी, अच्युत पटवर्धन, एनसी गोरे, अशोक मेहता सीके नारायण जैसे कांग्रेसी नेताओ से हुई. जेल में इन नेताओं ने मिलकर कांग्रेस सोसलिस्ट पार्टी बनाई. यह पार्टी समाजवाद में विश्वास रखती थी. बता दें कि साल 1934 में जब कांग्रेस ने चुनाव में हिस्सा लेने का फैसला किया था. तो उस दौरान जेपी और सीएसपी ने इसका पुरजोर विरोध किया था.

अंग्रेज सरकार के खिलाफ लोक आंदोलन को चलाया था

जेपी ने 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज सरकार के खिलाफ लोक आंदोलन का भी नेतृत्व किया. उन्होंने सरकार को किराया और राजस्व रोकने के लिए अभियान चलाया. टाटा स्टील कंपनी में जेपी ने हड़ताल करवा दिया, ताकि अंग्रेजों तक इस्पात नहीं पहुंचे. जिसके बाद अंग्रेजों ने जेपी को गिरफ्तार कर एक बार फिर से सलाखों के पीछे भेज दिया. इस दौरान जेपी को लगभग 9 माह तक जेल में बितानी पड़ी थी. जेपी जब जेल से बाहर आए तो, तब तक महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की राहें अलग हो चुकी थी. जिसके बाद जेपी ने दोनों को बीच सुलह कराने की कोशिश की थी. साल 1942 आते-आते देश में भारत छोड़ो आंदोलन अपने चरम पर था. इस दौरान अंग्रेजों ने एक बार फिर से जोपी को गिरफ्तार कर पहले मुंबई की आर्थर जेल फिर दिल्ली की कैंप जेल में रखा. इसके बाद अंग्रेजों ने जेपी को हजारीबाग के जेल में बंद कर दिया. जहां से जेपी देश को आजाद कराने की मुहिम चलाने के लिए जेल से फरार हो गये.

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