सुधरने के बजाय िबगड़े हालात
Edited by Prabhat Khabar Digital Desk
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समस्या. हाल उपस्वास्थ्य केंद्र अमैन का, लोग हो रहे हैं परेशान डाॅक्टर व कर्मचारी के लिए बने क्वार्टर खंडहर में तब्दील जहानाबाद : जिले के सदर प्रखंड अंतर्गत उपस्वास्थ्य केंद्र अमैन बदहाली का दंश झेल रहा है. सरकार द्वारा गांव को विकसित करने की दिशा में तो कई कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं एवं ग्रामीण […]
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समस्या. हाल उपस्वास्थ्य केंद्र अमैन का, लोग हो रहे हैं परेशान
डाॅक्टर व कर्मचारी के लिए बने क्वार्टर खंडहर में तब्दील
जहानाबाद : जिले के सदर प्रखंड अंतर्गत उपस्वास्थ्य केंद्र अमैन बदहाली का दंश झेल रहा है. सरकार द्वारा गांव को विकसित करने की दिशा में तो कई कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं एवं ग्रामीण व्यवस्था के पद्धति के सुधार में नल का जल, नाली गली का पक्कीकरण, हर घर को बिजली, शिक्षा व्यवस्था में सुधार एवं ग्रामीण चिकित्सीय व्यवस्था को सुदृढ़ करना जैसे योजना महत्वपूर्ण है. कई मायने में गांव की स्थिति में पहले के अपेक्षा काफी सुधार भी हुआ है,
लेकिन इस सुधार की कड़ी में ग्रामीण क्षेत्र की चिकित्सीय व्यवस्था नये युग निर्माण में कमजोर कड़ी के रूप में प्रदर्शित हो रही है. ग्रामीण क्षेत्र में स्थापित अस्पताल पुराने जमाने के अपेक्षा नये जमाने में स्थिति सुधरने के बजाय बिगड़ती चली गयी. बदलते व्यवस्था व हाइटेक जमाने में दंभ भर रही उपस्वास्थ्य केंद्र अमैन का हाल ऐसा ही है.
चिकित्सक की कमी से जूझ रहे अस्पताल को हाल के दिनों में भी सुधार नहीं दिख रहा है. ग्रामीण क्षेत्र के अन्य कई जगहों पर भी नजर दौड़ायें तो अस्पताल का हाल कमोबेश ऐसा ही नजर आता है. कहीं भवन जर्जर तो कहीं चिकित्सक की कमी सर्वत्र दिखायी देती है. अगर छोटे-छोटे अस्पताल में चिकित्सक की ड्यूटी लगी भी है तो उन्हें पीएचसी या जिला अस्पताल में प्रतिनियुक्ति पर रखा गया है. ऐसे में गांव के लोगों के प्रति स्वास्थ्य विभाग कितना संवेदनशील है यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है. अमैन स्वास्थ्य उपकेंद्र सह पशु चिकित्सालय अपनी उपेक्षा का दंश झेल रहा है. स्वास्थ्य केंद्र में चिकित्सक की ड्यूटी तो लगायी जाती है,
लेकिन अस्पताल में एक दिन भी चिकित्सक नहीं पहुंच पाते. हाल के दिनों में स्वास्थ्य विभाग के वरीय पदाधिकारियों के सर्वेक्षण में ग्रामीण चिकित्सकीय व्यवस्था कितनी पटरी पर चल रही है इसका खुलासा भी हुआ है. ग्रामीण सौरभ कुमार बताते हैं कि पुराना जिला गया के अंतर्गत बना इस अस्पताल में संसाधन की घोर कमी है. संसाधन की कमी के कारण अस्पताल खुद बीमार पड़ा है. अस्पताल में डाॅ के रहने के लिए आवासीय भवन का निर्माण कराया गया था, लेकिन क्वार्टर आज खंडहर में तब्दील हो गया है. उक्त परिसर में मरीज के जगह आवारा जानवर व असामाजिक तत्वों का जमावड़ा लगा रहता है. स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई तरह का सुधार किया गया है
लेकिन यहां दवा का भी अभाव दिखता है. ग्रामीण रामभरोसा प्रसाद सिंह बताते हैं कि कभी कभार डॉक्टर दूज की चांद की तरह नजर आते हैं लेकिन हाल के दिन में कई महीनों से अस्पताल में डाॅक्टर नहीं दिखायी पड़े हैं. परिणामस्वरूप ग्रामीणों को इलाज के लिए झोलाछाप डाॅक्टर या इधर उधर भटकना पड़ता है. उन्होंने बताया कि वर्ष 1986 में जहानाबाद जिले का अस्तित्व में आने पर कुछ दिन तो अस्पताल की व्यवस्था ठीक ठाक चलती रही, लेकिन साल दो साल के बाद ही
उपस्वास्थ्य केंद्र व पशु चिकित्सालय की दुर्दशा शुरू हो गयी. चिकित्सक के नहीं पहुंचने से अधिनस्त कर्मचारी भी केवल नाममात्र की ड्यूटी बजाते हैं. अस्पताल के अस्तित्व में नहीं रहने से स्वास्थ्य केंद्र श्मशान में तब्दील हो गया है. एएनएम के सहारे चल रहे स्वास्थ्य उपकेन्द्र में चिकित्सीय व्यवस्था केवल नाममात्र को है. व्यवस्था सुदृढ़ नहीं रहने के कारण इसका खामियाजा सबसे ज्यादा गरीब व निर्धन परिवारों को भुगतना पड़ता है.
ग्रामीण चिकित्सक कर रहे ऑपरेशन : करपी. मुख्यालय स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भले ही सर्जन चिकित्सकों की कमी हो लेकिन इसके आसपास झोला छाप सर्जनों की कोई कमी नहीं. जहां भोले-भाले लोग इन झोला छाप डॉक्टरों के हाथ लूटे जा रहे हैं वहीं अपनी जान भी जोखिम में डाल रहे हैं. सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के निकट ही आधे दर्जन सर्जन बैठे हुए हैं जिनकी योग्यता शायद इंटर भी नहीं होगी. लेकिन इन लोगों के पास रोगियों के जाने भर की बस देरी है ऑपरेशन तो इस कदर कर देते हैं मानो कोई बकरे, मुर्गे का ऑपरेशन करता हो. ऐसी बात नहीं है कि रोगी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं जाते जाते हैं लेकिन वहां तैनात कर्मी रोगियों के परिजनों को बरगला कर झोला छाप चिकित्सक के पास ले जाते हैं.
प्रसव पीड़ित महिलाओं को स्वास्थ्य कर्मी बरगला कर इन झोला छाप चिकित्सकों के पास जाते हैं. ईश्वर की कृपा से यदि साधारण रूप से प्रसव हो जाता है तो 12000 रुपये और यदि ऑपरेशन किया गया तो 20 हजार रुपये तक का बिल थमा दिया जाता है. क्योंकि इन लोगों के द्वारा किसी प्रकार की जांच किये बगैर ही ऑपरेशन कर दिये जाते हैं. ऐसे झोला छाप चिकित्सकों को स्वास्थ्य केंद्र के कर्मियों को भी सहयोग प्राप्त है.
खासकर कुछ आशा कार्यकर्ता एवं नर्स कर्मी भोले-भाले रोगियों को बहला फुसलाकर इन झोला छाप चिकित्सकों के पास ले जाते हैं. जिनमें कुछ ऐसे स्वास्थ्य कर्मी भी हैं जो स्वास्थ्य केंद्र में केवल उपस्थिति बनाने भर ही मतलब रख अपने निजी हॉस्पिटल खोल भोले-भाले लोगों को लूटने में लगे हैं. ऐसी बात नहीं चिकित्सा के वरीय पदाधिकारियों को इस संबंध में मालूम नहीं. सब पता होते हुए भी मौन धारण कर रखा है.
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