सेनारी नरसंहार. पीड़ितों ने कहा, अदालत का फैसला जख्मों पर मरहम
Edited by Prabhat Khabar Digital Desk
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ग्रामीणों ने कहा, कुछ दोषी अब भी पकड़ से बाहर जहानाबाद / करपी : 17 साल पूर्व सेनारी गांव के लोगों ने अपनों को खोने का जो दंश झेला है उसका दर्द शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता. रोते-कलपते महिलाओं और बच्चों की करुण पुकार ने एक बार सबको रुला दिया था. 18 मार्च […]
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ग्रामीणों ने कहा, कुछ दोषी अब भी पकड़ से बाहर
जहानाबाद / करपी : 17 साल पूर्व सेनारी गांव के लोगों ने अपनों को खोने का जो दंश झेला है उसका दर्द शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता. रोते-कलपते महिलाओं और बच्चों की करुण पुकार ने एक बार सबको रुला दिया था. 18 मार्च 1999 की रात को गांव के ठाकुरवाड़ी के समीप 34 निरीह लोगों के गर्दन रेत दिये गये थे. गांव के लोग कहते हैं कि जल्लादों ने हर शख्स को हलाल कर दिया था. हाथ-पांव बांधकर जितनी बेरहमी से लोगों को चबूतरे पर लेटाकर बारी-बारी से काटा गया था. यह सुनकर भी आज आम लोगों का कलेजा दहल जाता है और रूह कांप जाती है. अदालत का फैसला आने के बाद जब प्रभात खबर टीम लोगों से उनकी प्रतिक्रिया जानने गांव पहुंची तो चौपाल में बैठे लोगों ने दास्तां सुनाते-सुनाते रो दिया.
कहा भगवान का शुक्र है आज हम जिंदा हैं वरना पार्टी के लोगों की तैयारियां और भी बड़ी थी, बड़े इत्मिनान से लोगों को घरों से खींच-खींच कर बाहर निकाला जा रहा था. जो बच गये मानो उन्हें यमराज ने बचाया हो. हर घर के कमरों को खंगाला गया था. अदालत के फैसले पर गांव वालों ने कहा कि पुलिस ने बहुत लोगों को सजा पाने से बचा लिया. और भी लोग जो नरसंहार में शामिल थे वे सजा के हकदार थे लेकिन उन्हें सजा नहीं मिलने से दर्द भी है. सरकार की नीतियों की गांव वालों ने खिलाफत की है.
गांव की गलियों में दिखी चहलकदमी, चर्चा का बाजार रहा गर्म : बहुचर्चित सेनारी नरसंहार का फैसला आते ही नरसंहार पीड़ितों के बीच खुशी की लहर दौड़ गयी. न्यायालय द्वारा 10 अभियुक्तों को फांसी की सजा मुकर्रर की गयी है और तीन लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी है. नरसंहार पीड़ित परिवार के लोगों में 27 अक्तूबर 2016 को उस वक्त मायूसी छा गयी थी जब न्यायालय से साक्ष्य के अभाव में 23 आरोपियों को रिहा किया गया था. इसे लेकर सरकार की नीतियों की आलोचना सेनारी के लोगों ने की थी. अपने प्रियजनों को गंवाने वालों के बीच तब मायूसी छा गयी थी. लेकिन 17 साल बाद 10 अभियुक्तों को फांसी और तीन को उम्रकैद की सजा सुनाये जाने के बाद पुराने जख्मों पर कुछ मरहम जरूर लगा है. फिर भी राज्य सरकार की ढुलमुल नीति की आलोचना ग्रामीण अवश्य कर रहें हैं.
नरसंहार में अपना सबकुछ गंवा देने वाले पीड़ित परिवारों को यह मलाल जरूर है कि कही न कहीं सूबे की सरकार की पुलिस साक्ष्य जुटाने में विफल साबित हुई. परिणाम स्वरूप 23 आरोपित न्यायालय द्वारा बरी हो गये. नरसंहार में अपने कई प्रियजनों को खोने वाले मुकेश कुमार ने बताया कि इस जघन्य घटना में उनके चाचा और चचेरे भाई की हत्या निर्ममता पूर्वक कर दी गयी थी.
उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि अनुसंधान में आरोपियों के विरुद्ध साक्ष्य जुटाने में पुलिस विफल साबित हुई, जिस कारण महज इतने बड़े नरसंहार में 15 लोगों को ही सजा मिल सकी. वहीं इस जघन्य नरसंहार में अपने स्वजनों को खोने वाले आशुतोष कुमार शर्मा का कहना है कि 17 साल से न्याय का इंतजार कर रहे नर संहार पीड़ितों के जख्मों पर पूरी तरह मरहम नही लगाया गया. निरीह ग्रामीणों का कत्लेआम जिस बर्वरता पूर्वक की गयी उसमें सैकड़ों लोगों की संलिप्तता रही थी.
ऐसे में मात्र15 लोगों को ही सजा सुनाना नाकाफी है. पीड़ित ग्रामीणों के लिए वर्षों से न्याय का इंतजार धूमिल साबित हुआ है. वहीं गांव के पूर्व मुखिया कमलेश शर्मा ने बताया कि हमलोगों को वर्षों पूर्व मिला यह जख्म फैसले के साथ पुन: हरा हो गया. इस नरसंहार में आरोपियों को बचाने के लिए राज्य सरकार के द्वारा पक्षपात करने का उन्होंने आरोप लगाया है. उनका कहना है कि सेनारी नरसंहार के समय राबड़ी देवी सूबे की मुख्यमंत्री थीं और आज उन्हीं के सहयोग से बिहार में सरकार चल रही है. ऐसे में महज 15 आरोपियों के विरोध में ही साक्ष्य उपलब्ध करवाया जा सका और अन्य आरोपियों को बचाने में सरकार के द्वारा भूमिका निभायी गयी.
गांव की गलियों में दिखी चहलकदमी, चर्चा का बाजार रहा गरम
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