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गायब होती जा रही होली में फाग गीतों के गाने की परंपरा

Updated at : 13 Mar 2025 9:04 PM (IST)
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गायब होती जा रही होली में फाग गीतों के गाने की परंपरा

होली में अब फाग गीत और ढोलक व झाल की आवाज़ इक्का दुक्का जगहों को छोड़ सुनाई नहीं पड़ रही है. मन लुभावन होली के पारंपरिक गीत जैसे विलुप्त होते जा रहे है.

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सोनो. होली में अब फाग गीत और ढोलक व झाल की आवाज़ इक्का दुक्का जगहों को छोड़ सुनाई नहीं पड़ रही है. मन लुभावन होली के पारंपरिक गीत जैसे विलुप्त होते जा रहे है. ग्रामीण क्षेत्र में भी इसके प्रति लोगों का झुकाव कम हुआ है. अब नयी पीढ़ी को न तो स्थानीय होली गीत गाने आता है न होली के सुर वाला ढोलक बजाने आता है. गांव में कुछ उम्र दराज लोग एक दो दिन फाग गीत गाकर अपनी रश्म पूरी कर लेते हैं. दशक पूर्व की बात की जाय तो सरस्वती पूजा के बाद से होली तक हर रात ग्रामीणों की टोली द्वारा ढोलक व झाल के एक विशिष्ट आवाज़ के साथ होली के गीत गाये जाते थे. वृहद स्तर पर सामाजिक समरसता को दर्शाने वाला यह पारंपरिक पर्व अब लगभग सिमटता गया है. एकता और भाईचारा का प्रतीक होली के त्योहार में अब पौराणिक प्रथाएं पूरी तरह गौण हो चुकी हैं. इसके स्वरूप और मायने भी बदल चुके हैं.

वसंत पंचमी के बाद ही फाग गायन की रही है परंपरा

वसंत पंचमी के बाद से ही फाग गायन की परंपरा रही है. होली का त्योहार आते ही कभी ढोलक की थाप व मंजीरों पर देर रात तक फाग गीत गुंजायमान होने लगते थे लेकिन आधुनिकता के दौर में आज ग्रामीण क्षेत्रों की यह परंपरा लुप्त सी हो गई है. फाग गीत अपनी मधुर धुन से सभी को अपनी ओर आकर्षित करते थे लेकिन अब पश्चिमी सभ्यता व संस्कृति युवाओं पर इस कदर हावी हो गई है की पुरानी लोकगीत और परंपराएं विलुप्त होती नजर आ रही है. एक समय था जब फागुन महीना आते ही हर गांव में फागुनी गीत सुनाई देते थे. बड़े, बूढ़े, जवान सभी एक साथ मंदिर, मैदान, चौपाल या गांव के किसी व्यक्ति के दरवाजे पर शाम होते ही बैठ जाते थे. होली के गीत, फगुआ, लोक गीतों की धुन पर जैसे पूरा गांव ही फागुनी बयार में डूब जाता था. इन गीतों से गांव की एकता और परस्पर प्रेम परवान चढ़ता था.

डीजे की कर्कश शोर में गुम हो गयी फाग की मधुरता

चुरहेत निवासी शिक्षाविद कामदेव सिंह कहते है कि समय के साथ जैसे-जैसे यह लोकगीत और परंपराएं गायब हो रही है. वैसे ही गांव की एकता, परस्पर प्रेम और आदर भी विलीन होता जा रहा है. रंगों से सराबोर कर देने वाली होली में मिठास घोलने वाली होली के गीत अब खामोश हो गई है. फाग का राग, ढोलक की थाप और झांझों की झंकार में जो मिठास थी अब वह मिठास डीजे की शोर में गुम हो गया है. कभी रंगो में प्यार और अपनत्व की भावना से मनाए जाने वाला होली पर्व अब फीकी पड़ने लगी है. उन्होंने कहा कि गांव के युवाओं का यह दायित्व है कि इस परंपरा को जीवंत रखें.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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PANKAJ KUMAR SINGH

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By PANKAJ KUMAR SINGH

PANKAJ KUMAR SINGH is a contributor at Prabhat Khabar.

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