वैशाली को दुनिया में पहचान दिलाने वाले जगदीश चंद्र माथुर की जयंती रही फीकी, नहीं हुआ कोई सरकारी कार्यक्रम

Updated:
विज्ञापन

जन्म जयंती पर भी उपेक्षित रहे वैशाली को नई पहचान दिलाने वाले जगदीश चंद्र माथुर। | Prabhat Khabar Network

WhatsApp चैनल से जुड़ेंगूगल पर प्रभात खबर चुनें

वैशाली की ऐतिहासिक पहचान को विश्व पटल पर लाने वाले इतिहासकार जगदीश चंद्र माथुर की जयंती पर सरकारी उदासीनता से स्थानीय लोग नाराज हैं। उनकी प्रतिमा के पास भी कोई श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं हुआ।

विज्ञापन

jagdish chandra mathur birth anniversary : वैशाली की ऐतिहासिक पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने वाले प्रख्यात इतिहासकार, साहित्यकार, नाटककार और पूर्व आईसीएस अधिकारी स्व. जगदीश चंद्र माथुर की जयंती गुरुवार को सादगी के बीच गुजर गई. 16 जुलाई को उनकी जयंती पर न तो किसी सरकारी विभाग की ओर से कार्यक्रम आयोजित किया गया और न ही किसी सामाजिक या राजनीतिक संगठन ने उनकी प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की. इसे लेकर क्षेत्र के बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने गहरी नाराजगी जताई.

विज्ञापन

vaishali News : जयंती पर नहीं हुई कोई श्रद्धांजलि सभा

समाजसेवी राधामोहन सिंह, मुनचुन सिंह, प्रो. रामनरेश राय, प्रो. विनय पासवान, इंद्रदेव राय, मनोज सिंह, मंटुन सिंह, राजीव सिंह, विवेक कुमार निक्कू और चंदन कुमार सहित कई लोगों ने कहा कि जिस व्यक्ति ने वैशाली की ऐतिहासिक विरासत को देश-दुनिया तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उसकी जयंती पर पूरी तरह सन्नाटा रहना दुर्भाग्यपूर्ण है. उन्होंने इसे सांस्कृतिक विरासत की उपेक्षा बताया.

वैशाली महोत्सव की शुरुआत में निभाई थी अहम भूमिका

16 जुलाई 1917 को उत्तर प्रदेश के खुर्जा में जन्मे जगदीश चंद्र माथुर वर्ष 1941 में भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) में चयनित हुए थे. वर्ष 1944 में हाजीपुर के अनुमंडलाधिकारी के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने वैशाली के ऐतिहासिक महत्व को नई पहचान दिलाने का अभियान शुरू किया. डॉ. योगेंद्र मिश्रा, जगन्नाथ प्रसाद साहू और महान शिल्पी उपेंद्र महारथी के सहयोग से उन्होंने वैशाली संघ की स्थापना की तथा वैशाली महोत्सव की शुरुआत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

हिंदी साहित्य और रंगमंच के भी थे बड़े नाम

जगदीश चंद्र माथुर हिंदी साहित्य और रंगमंच के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर थे. उनकी प्रमुख कृतियों में भोर का तारा, कोणार्क, ओ मेरे सपने, शारदिया, दस तस्वीरें, परंपराशील नाट्य, पहला राजा और जिन्होंने जीना जाना जैसी चर्चित रचनाएं शामिल हैं. उनका निधन 14 मई 1978 को हुआ था.

प्रतिमा तो है, लेकिन याद करने वाला कोई नहीं

उनकी स्मृति में 29 मार्च 1991 को अभिषेक पुष्करणी के तट स्थित निरीक्षण भवन परिसर में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई थी. स्थानीय लोगों का कहना है कि आज उनकी प्रतिमा उपेक्षा का शिकार है. जयंती के दिन भी वहां कोई कार्यक्रम नहीं हुआ. लोगों ने मांग की कि उनके योगदान को देखते हुए हर वर्ष सरकारी स्तर पर जयंती समारोह आयोजित किया जाए, ताकि नई पीढ़ी उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से प्रेरणा ले सके.


आपके शहर में

विज्ञापन

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन