गया जी के स्वतंत्रता सेनानी त्रिवेणी शर्मा सुधाकर, 12 साल की उम्र में बनाया बाल संघ; 14 में भारत छोड़ो आंदोलन में कूदे
स्वतंत्रता सेनानी त्रिवेणी शर्मा सुधाकर | Prabhat Khabar Network
जानें स्वतंत्रता सेनानी त्रिवेणी शर्मा 'सुधाकर' की प्रेरणादायक यात्रा, जिन्होंने 12 साल की उम्र में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई. 14 साल की उम्र में भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले इस वीर सपूत की अनूठी गाथा.
स्वतंत्रता सेनानी त्रिवेणी शर्मा 'सुधाकर' ने 12 वर्ष की उम्र में ही ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ 'बाल संघ' का गठन कर आंदोलन की शुरुआत की थी. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में मात्र 14 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने गांव मंझियावां में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ प्रभात फेरी निकालकर स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बने थे. 1942 की अगस्त क्रांति में कुर्था गोली कांड में वे ब्रिटिश हुकूमत की गोली से घायल हो गए थे. इसके बाद भूमिगत रहकर उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई.
विरासत में मिली देश प्रेम की भावना
देश प्रेम का जज्बा इन्हें विरासत में मिली थी. इनके पिता स्वर्गीय कैलाश शर्मा काफी सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी रहे. इनका जन्म तत्कालीन गया जिला (वर्तमान अरवल) के कुर्था थाना क्षेत्र के मंझियावां गांव में एक किसान परिवार में 28 नवंबर 1928 को हुआ था.
आजादी मिलने तक जिले में आयोजित स्वाधीनता आंदोलन के प्रायः सभी संघर्षों में इन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. इसी दौरान वे स्वामी सहजानंद सरस्वती द्वारा जमींदारी उन्मूलन आंदोलन में भी शामिल हुए और साम्यवादी विचारधारा से प्रेरित होकर दल में शामिल हो गए.
आदर्श और विचारधारा का प्रभाव
सुधाकर जी ने एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में पेंशन लेने से भी इनकार कर दिया था. उनके जीवन पर शहीदे आजम भगत सिंह, स्वामी सहजानंद सरस्वती, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. श्रीकृष्ण सिंह, अनुग्रह नारायण सिंह और स्वतंत्रता सेनानी यदुनंदन शर्मा का व्यापक प्रभाव पड़ा.
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वे आर्य समाज से भी प्रभावित रहे. आजादी के बाद किसान आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें 1949-50 में जेल जाना पड़ा. बाद में अलग-अलग आंदोलनों के लिए उन्होंने नौ बार जेल की यात्रा की.
संगठनों की स्थापना और जनवादी कार्य
अगस्त 1950 में उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ग्रहण की. 29 अक्तूबर 1950 को उन्होंने जिला में जनवादी युवक संघ व 31 मई 1951 में बिहार राज्य जनवादी नौजवान संघ की स्थापना की.
बाद में जिला तरुण साहित्यकार संघ, भारतीय लोक सांस्कृतिक मगही मंच की भी स्थापना की. इसके अलावा कई जनवादी संगठनों में भी वे विभिन्न पदों पर रहे.
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साहित्यिक रचनाएं और अंतिम समय
त्रिवेणी शर्मा 'सुधाकर' एक क्रांतिकारी के साथ-साथ अच्छे साहित्यकार व सजग पत्रकार भी थे. इन्होंने 'भारतीय स्वतंत्रता संग्राम', 'युग प्रवर्तक साहित्यकार प्रेमचंद', 'अखिल भारतीय किसान सभा का गौरवशाली साठ वर्ष', 'फूल और शूल', 'जगा हिंदुस्तान', 'शंखनाद', 'मगही तरंग', 'मगही लहर', 'जननायक स्वामी सहजानंद सरस्वती', 'पंडित यदुनंदन शर्मा', 'जनवादी विद्रोह कवि कबीर', 'मई दिवस का गौरवशाली इतिहास' जैसी पुस्तकों की रचना व संपादन किया.
देश को आजादी मिलने के बाद वे जीवन पर्यंत शोषित-पीड़ित आवाम व सांप्रदायिक सद्भाव के लिए संघर्ष करते रहे. 87 वर्ष की उम्र में 24 मार्च 2014 को इनका निधन हो गया.
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