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देश में न कभी तलाक की व्यवस्था थी न थे वृद्धाश्रम, आधुनिक शिक्षित समाज में देखना पड़ रहा यह सब

Updated at : 22 Jun 2024 11:55 PM (IST)
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देश में न कभी तलाक की व्यवस्था थी न थे वृद्धाश्रम, आधुनिक शिक्षित समाज में देखना पड़ रहा यह सब

लनामिवि के पीजी हिंदी एवं उर्दू विभाग के संयुक्त तत्वावधान में ‘कबीर-नागार्जुन: समग्र विमर्श’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी वनस्पति विज्ञान विभाग के सभागार में हुई.

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दरभंगा. कबीर और जनकवि नागार्जुन की जयंती पर लनामिवि के पीजी हिंदी एवं उर्दू विभाग के संयुक्त तत्वावधान में ‘कबीर-नागार्जुन: समग्र विमर्श’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी वनस्पति विज्ञान विभाग के सभागार में हुई. उज्जैन से पधारे मुख्य वक्ता प्रो. रोहिताश्व कुमार शर्मा ने कहा कि भारत में न कभी तलाक की व्यवस्था थी न ही वृद्धाश्रम का चलन था. आज के आधुनिक शिक्षित समाज में यह सब देखना पड़ रहा है. नागार्जुन की रचनाओं में यह सब उस दौर में ही चित्रित हुआ है. कहा कि कबीर यूं ही वाणी के डिक्टेटर नहीं कहलाते. जीवन और साहित्यिक कर्म का साम्य उन्हें युगपुरुष की श्रेणी में खड़ा करता है. आज की शासन व्यवस्था पर सवाल उठाया. कहा कि अगर राजनीति इतनी ही पाक साफ होती तो देश की यह दशा क्यों होती. कहा कि शासकीय व्यवस्था से बंधे होने के कारण वे नागार्जुन की तरह अभिधा में बात नहीं करेंगे. धूमिल की भाषा में बात करूंगा. धूमिल ने जब यह कहा कि ‘पूंछ उठा कर जिसको देखा उसको मादा पाया है’ तब उन्होंने इस व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य किया था. उद्घाटनकर्ता सांसद डॉ गोपाल जी ठाकुर ने कहा कि नागार्जुन की जो कल्पना थी, उसे केंद्र सरकार हकीकत में बदल रही है. कहा कि दरभंगा ही संपूर्ण देश में एकमात्र ऐसी जगह है, जहां एक परिसर में दो विश्वविद्यालय है. इस महान दान के लिए दरभंगा राज परिवार के प्रति सांसद ने कृतज्ञता ज्ञापित की. छात्रों से कहा कि जिसने भी अपने ऊपर विश्वास किया, वह मुकाम तक पहुंचा है. अध्यक्षीय उद्बोधन में मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. एके बच्चन ने कहा कि नागार्जुन और कबीर को बार-बार पढ़ा जाना चाहिए. हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. उमेश कुमार ने नागार्जुन के व्यंग्य के तीखेपन को उद्धृत करते हुए कहा कि वे गोलियों और तोपों से डरने वाले नहीं थे. तब ही इंदिरा गांधी जैसी ताकतवर प्रधानमंत्री के लिए उन्होंने कहा था ‘इंदु जी इंदु जी क्या हुआ आप को सत्ता के मद में भूल गई बाप को.’ कहा कि कबीर की साखी जीवन का यथार्थ है. दूसरे सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. चंद्रभानु प्रसाद सिंह ने कहा कि कबीर और नागार्जुन में वैचारिक समता है. दोनों ने धार्मिक वाह्याडंबर का विरोध किया. उनकी रचनाओं में व्यंग्य है, जिसके केंद्र में करुणा है. कबीर और नागार्जुन जीवन संघर्ष के कवि हैं, जिसका प्रतिफलन उनकी कविताओं में हुआ है. प्रधानाचार्य डॉ विजय कुमार ने कहा कि आज नागार्जुन और कबीर पर बोलना भी जोखिम भरा है. इमरजेंसी के दौरान जिस प्रकार की रचनाएं नागार्जुन ने की वह अद्वितीय है. अनिल कुमार शुक्ल ने कहा कि प्रेमचंद की तरह ही नागार्जुन भी सामाजिक जीवन को ही अपनी रचनाओं में चित्रित करते हैं. डॉ नंद किशोर पंडित ने कहा कि नागार्जुन का दर्शन और साहित्य उनका कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शोधार्थियों ने शोध पत्र का वाचन किया. मंच संचालन कृष्णा अनुराग एवं समीर कुमार, धन्यवाद ज्ञापन उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ गुलाम सरवर ने किया. वीणा, सुभद्रा, निशा और खुशबू ने स्वागत गीत गाये. मौके पर डॉ सुरेश पासवान, डॉ तीर्थनाथ मिश्र, डॉ उमेश कुमार शर्मा, डॉ ज्वाला चंद्र चौधरी, डॉ शंभू पासवान, धर्मेंद्र कुमार, समेत बड़ी संख्या में प्राध्यापक, शोधार्थी और छात्र–छात्राएं उपस्थित रहे. इससे पूर्व परिसर में स्थापित नागार्जुन की प्रतिमा पर सांसद समेत अन्य ने माल्यार्पण किया.

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