Darbhanga News:आधुनिक काल की पांच पुस्तकों ने पांडित्य से पूरे विश्व को किया प्रभावित
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 28 Nov 2024 11:30 PM
Darbhanga News:इस काल में दर्शन, विज्ञान, साहित्य आदि विभिन्न क्षेत्रों में भाष्य, टीका और मौलिक ग्रंथों का प्रणयन हुआ.
Darbhanga News:दरभंगा. महाराजाधिराज डॉ कामेश्वर सिंह की जयंती पर महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन की ओर से कल्याणी निवास में महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह स्मृति व्याख्यान के तहत “आधुनिक भारत की सारस्वत साधना : संस्कृत पांडित्य परंपरा के संदर्भ में ” विषय पर प्रसिद्ध विद्वान प्रो. राधा वल्लभ त्रिपाठी ने व्याख्यान दिया. प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि शास्त्र परंपरा की 10 हजार वर्षों की सतत विकास यात्रा के क्रम में बीसवीं शती में भी नवीन मौलिक ग्रंथों का प्रणयन हुआ है. कहा कि बिहार के रहने वाले बीसवीं शती के दार्शनिक महामहोपाध्याय रामावतार शर्मा (1877 – 1928) का परमार्थदर्शनम् दार्शनिक कृति है. यह भारतीय दर्शन का नवीनतम क्षेत्र है. प्रो. त्रिपाठी ने आधुनिक काल के पांच पुस्तकों की चर्चा की. कहा कि इन पुस्तकों ने आधुनिक पांडित्य से पूरे विश्व में प्रभावित किया है. पहली पुस्तक महानिर्वाणतंत्र है, जो 1775-1875 के बीच लिखी गई. इसमें पंचम वर्ण का उल्लेख है. जातिप्रथा और छूआछूत से परे समाज की चर्चा है. दूसरी पुस्तक शब्दार्थरत्नाकर है. यह वाक् का दर्शन है. तीसरी पुस्तक सनातन धर्मोद्धारोद्धार, चौथी परमार्थ दर्शनम् व पांचवीं काव्यालंकार कारिका है. ये पांचों पुस्तकें आधुनिक दर्शन, समाजिक विज्ञान, भाषा विज्ञान, तर्कशास्त्र आदि क्षेत्रों में नवीन ज्ञान को प्रतिपादित करते हैं. इसका श्रेय भारत को है. किन्तु, पश्चिमी छल ने हमसे हमारा ज्ञान तो लिया, किन्तु श्रेय हमें नहीं दिया.
भारतीय शास्त्र परंपरा पांच चरणों में विभक्त
प्रो. त्रिपाठी ने भारतीय शास्त्र परंपरा को पांच चरणों में विभक्त करते हुए, इनकी व्याख्या की. प्रथम चरण उदभव काल 5000 विक्रम पूर्व से 1000 विक्रम पूर्व का कालखंड है. इस काल में चारों वेदों और वेदांगों का संकलन हुआ. दूसरा चरण उन्मेष काल 1000 विक्रम पूर्व से विक्रमाविर्भाव वर्ष तक है. इस काल में सूत्र साहित्यों का प्रणयन हुआ. तीसरा चरण विकास काल है, जो प्रथम शती से 10वीं शती तक चला. इस काल में पूर्व की पुस्तकों के भाष्य लिखे गए. कहा कि भारतीय ज्ञान और दर्शन का सर्वाधिक विस्तार इसी कालखंड में हुआ. चौथा चरण विस्तार काल है, जो ग्यारहवीं शती से अठारहवीं शती तक चला. इस काल में दर्शन, विज्ञान, साहित्य आदि विभिन्न क्षेत्रों में भाष्य, टीका और मौलिक ग्रंथों का प्रणयन हुआ. अरबों एवं अन्य विदेशी विद्वानों द्वारा भारतीय ग्रंथों का अपनी भाषा में अनुवाद किया गया. भारतीय ज्ञान परंपरा का विस्तार पूरे एशिया और यूरोपीय महाद्वीप में हुआ. उन्नीसवीं से भारतीय सारस्वत साधना का पांचवां चरण जारी है.
मिथिला के पारम्परिक ज्ञान परम्परा की हुई चर्चा
समारोह की अध्यक्षता करते हुए आइआइटी चेन्नई के पूर्व प्राध्यापक प्रो. श्रीश चौधरी ने मिथिला के पारम्परिक ज्ञान परम्परा की चर्चा की. यहां के लोगों द्वारा नवीन भाषा को सीखने की जिज्ञासा के बारे में बताया.
रियाज – ए – तिरहुत के द्वितीय संस्करण का लोकार्पण
””कामेश्वर सिंह बिहार हेरिटेज सीरीज” के अन्तर्गत अयोध्या प्रसाद ””बहार”” रचित एवं प्रो. हेतुकर झा द्वारा सम्पादित “रियाज – ए – तिरहुत ” के द्वितीय संस्करण का लोकार्पण हुआ. पुस्तक परिचय डॉ मंजर सुलेमान ने प्रस्तुत किया. इससे पूर्व कार्यक्रम की शुरुआत भगवती वंदना से हुई. अतिथियों ने महाराजाधिराज के चित्र पर माल्यार्पण कर श्रद्धा सुमन अर्पित किये. फाउंडेशन के कार्यकारी पदाधिकारी श्रुतिकर झा ने अतिथियों का परिचय कराया. स्वागत भाषण पंडित रामचंद्र झा व धन्यवाद ज्ञापन डॉ जेके सिंह ने किया.
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