कैंपस... संस्कृत विवि में लागू होगी नयी शक्षिा नीति

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कैंपस… संस्कृत विवि में लागू होगी नयी शिक्षा नीति नयी शिक्षा नीति के 20 बिंदुओं पर हुआ मंथन विभागाध्यक्षों की बैठक में बिंदुवार हुई व्यापक चर्चा फोटो संख्या- 05परिचय- नयी शिक्षा नीति की बैठक में मौजूद पूर्व कुलपति डॉ रामचंद्र झा व विभागाध्यक्ष. दरभंगा. नयी शिक्षा नीति के तहत उच्च शिक्षा के आवश्यक एवं अपेक्षित […]

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कैंपस… संस्कृत विवि में लागू होगी नयी शिक्षा नीति नयी शिक्षा नीति के 20 बिंदुओं पर हुआ मंथन विभागाध्यक्षों की बैठक में बिंदुवार हुई व्यापक चर्चा फोटो संख्या- 05परिचय- नयी शिक्षा नीति की बैठक में मौजूद पूर्व कुलपति डॉ रामचंद्र झा व विभागाध्यक्ष. दरभंगा. नयी शिक्षा नीति के तहत उच्च शिक्षा के आवश्यक एवं अपेक्षित सुधार के लिए स्नातकोत्तर विभागाध्यक्षों, संकायाध्यक्षों एवं शिक्षकों के बीच सोमवार को कामेश्वर सिंह दरभंगा विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर व्याकरण विभाग में निर्धारित प्रत्येक बिंदु के मानक पक्षों पर मंथन किया गया. वहीं 20 सूत्री नयी शिक्षा नीति के प्रस्ताव को वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया. उल्लेखनीय है कि मानव संसाधन विकास विभागी, नई दिल्ली द्वारा नयी शिक्षा नीति के तहत विश्वविद्यालय में प्राप्त पत्र के आलोक में उच्च शिक्षा के उन्नयन पर विद्वानों, शिक्षकों से विचार प्राप्त करके इसमें आवश्यक संशोधनों को लागू करने का प्रस्ताव दिया गया. पाठ्यक्रम में संशोधन, शासी निकाय के दायित्व, महाविद्यालय के कार्य एवं अधिकार क्षेत्र एवं विश्वविद्यालय की पूर्ण स्वायतता पर बैठक में उपस्थित सभी मान्य सदस्यों के बीच बिंदुश: क्रमित सुधार के लि अपने-अपने सुझाव के साथ आपसी सहमति के पश्चात संशोधन किया गया. विवि को केंद्रीय विवि का दर्जावहीं प्रदेश का एकमात्र कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विवि, दरभंगा को राष्ट्रीय मूल्यांकन, एवं प्रत्यायन परिषद द्वारा मूल्यांकन कराकर इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिये जाने पर उक्त बैठक में अभिनिवेश डाला गया. कार्यों के विकेंद्रीयकरण पर जोरउपस्थित सदस्यों ने विश्वविद्यालयों की पूर्ण स्वायतता के साथ-साथ प्रशासनिक एवं शैक्षणिक गतिविधियों में सम्यक सुधार के लिए कार्यों के विकेंद्रीय करण पर भी जोर दिया. सदस्यों की सामूहिक राय थी कि कार्यों के विकेंद्रीयकरण से उसके कार्यान्वयन की गुणवत्ता बढ़ जाती है. सभी लोगों की कार्यक्षमता व विशेषज्ञता एक जैसी नहीं होती है. इसलिए कार्य की प्रकृति को देखते ही उसके अनुरूप कार्य करनेवाले की अभिरूचि भी देखनी होगी. इस प्रकार यदि उत्तरदायित्व को बांटकर किया जायेगा तो निश्चित ही परिणाम बेहतर हो सकेगा. सदस्यों ने सामाजिक मानकों को भी आधार बनाकर उच्च शिक्षा में इसे शामिल कर इसके शैक्षणिक गतिविधि में सुधार की पेशकश की. इसके अतिरिक्त सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के छात्रों के लिए नामांकन एवं अध्ययन के लिए छात्रवृत्ति की व्यवस्था करने से संबद्ध बिंदुओं पर भी आवश्यक संशोधन कर उत्तर तैयार किया गया. संस्कृत शिक्षा की अनिवार्यताशिक्षा के क्षेत्र में निरंतर क्षीण हो रही भारतीय संस्कृति के लिए संस्कृत की अनिवार्यता उपादेयता की व्याख्या करते हुए सदस्यों ने तकनीकी महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों के साथ -साथ सभी शिक्षण संस्थाओं में संस्कृत के समस्त ज्ञान को समाहित करने का प्रस्ताव दिया. वहीं भ्रष्टाचार के उन्मूलन के साथ शिक्षा में नैतिकता एवं सच्चरित्रता के लिए संस्कृत को आवश्यक बताते हुए इसे प्राथमिक स्तर से स्नातकोत्तर तक समावेश करने का सुझाव दिया. नीतिगत परामर्श के लए प्रश्नउच्च शिक्षा के संबंध में नीतिगत निर्णय के लिए प्रश्न पर विमर्श किया गया. अभिशासन में सुधार, गुणवत्ता संस्थानों की रैकिंग, विनियमन की गुणवत्ता बेहतर बनाना, केंद्रीय संस्थानों की गति निर्धारक भूमिका, राज्य के सार्वजनिक विवि को बेहतर बनाना, उच्च शिक्षा में कौशल विकास शामिल करना, मुक्त तथा दूरस्थ शिक्षा और ऑनलाइन पाठ्यक्रमों का संबर्द्धन, प्रौद्योगिकी समर्थित शिक्षा के अवसर, क्षेत्रीय विषमताओं को दूर करना, जेंडर और सामाजिक अंतरालों को पटना, उच्च शिक्षा को समाज से जोड़ना, सर्वोत्तम अध्यापक तैयार करना, छात्र सहयोग प्रणालियों को बनाये रखना, भाषा के माध्यम से सांस्कृतिक एकीकरण को बढ़ावा देना, निजी क्षेत्र के साथ सार्थक भागीदारी, उच्च शिक्षा का वित्त पोषण, उच्च शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण, शिक्षा को नियोजनीयता से जोड़ने के लिए उद्योग जगत से संपर्क स्थापित करना, अनुसंधान व नवाचार को बढ़ावा देना एवं नया ज्ञान. उक्त बिंदुओं पर तीन दिनों से विद्वानों के द्वारा व्यापक चर्चा हुई. संयोजक डॉ विमल नारायण ठाकुर ने बताया कि प्रत्येक बिंदु पर विमर्शोपरांत संदर्भित बिंदुओं के उत्तर अंकित कर दिये गये हैं. उक्त आयोजित विमर्श में पूर्व कुलपति डॉ रामचंद्र झा, डॉ विद्येश्वर झा, डॉ बौआनंद झा, डॉ चित्रधर झा, डॉ गंगेश ठाकुर, डॉ मीना कुमारी, डॉ पुरेंद्र वारिक, डॉ विनय कुमार मिश्र, डॉ श्रवण कुमार चौधरी, डॉ चौठी सदाय, डॉ हरेंद्र किशोर झा आदि शामिल थे.

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