केले के नाम पर कहीं जहर तो नहीं खा रहे ! सेहत से खिलवाड़
Edited by Prabhat Khabar Digital Desk
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बेतिया : अच्छी सेहत के लिए सब लोग फल खाने पर जोर देते हैं. बीमार पड़ने व स्वस्थ रहने के लिहाज से डॉक्टर फल खाने की सलाह देते हैं. ताकि शरीर को प्रचुर मात्रा में मिनरल, विटामिन, आयरन आदि तत्व मिलें. मगर फलों के नाम पर शहर में जो बिक रहा है, वह स्वास्थ्य के […]
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बेतिया : अच्छी सेहत के लिए सब लोग फल खाने पर जोर देते हैं. बीमार पड़ने व स्वस्थ रहने के लिहाज से डॉक्टर फल खाने की सलाह देते हैं. ताकि शरीर को प्रचुर मात्रा में मिनरल, विटामिन, आयरन आदि तत्व मिलें.
मगर फलों के नाम पर शहर में जो बिक रहा है, वह स्वास्थ्य के लिए लाभ पहुंचाने के बजाय नुकसान ही पहुंचा रहा है. बाजार समिति, कालीबाग व अन्य बाजारों में केला को फसलों पर कीटों से बचाव के लिए छिड़काव करने वाले कीटनाशी को पानी में मिलाकर केले को पकाया जा रहा है. लेकिन इसे इस ढंग से पकाये जाने पर आज सब आंखें मूंदे हुए हैं. चित्तीदार केला गायब है, लेकिन हरा व पीला केला ही बाजार में नजर आता है. स्वास्थ्य विशेषज्ञ डाॅ अमिताभ चौधरी का कहना है कि केले प्राकृतिक तरीके या धुआं कर (धुंककर) पके हों, तो स्वास्थ्य के लिये बेहतर हैं. मगर खतरनाक केमिकल से पकाये गये केले खतरनाक हैं.
बाजार में इन दिनों जो केला बेचा जा रहा है उसका 95 प्रतिशत हिस्सा कार्बाइड व केमिकल युक्त पानी में भिगोकर पकाया जा रहा है. चंद ही मिनटों में केले को पकाने का खेल चल रहा है. इस धंधे में लगे फल व्यवसायी तर्क देते हैं कि केले की पर्व-त्योहारों में बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए वह ऐसा कर रहे हैं. पहले बर्फ व धुआं में केला पकाया जाता था, जिसमें एक सप्ताह तक का वक्त लगता था और बर्फ व धुआं का पका केला चित्तीदार होता था, लेकिन अब बर्फ में कौन पकाये ?
बाजार समिति के केला गोदाम क्षेत्र में इस तरह से केले को पकाने वाले एका-दुक्का व्यवसायियों ने नाम नहीं छापने के शर्त पर बताया कि यदि केले को बर्फ से पकाया है, तो उसका डंठल काला पड़ जाता है और केले का रंग गर्द हरा व पीला हो जाता है. साथ ही केले पर थोड़े बहुत काले दाग रहते हैं. इसलिए उसे चित्तीदार केला कहा जाता है. मगर केले को कार्बाइड का इस्तेमाल करके पकाया गया तो उसमें कोई दाग-धब्बे नहीं होते. मगर यह फ्रिज में रखने पर कुछ ही घंटों में पूरी तरह से काला हो जाता है. ज्यादा वक्त यह टिकता नहीं है.
उष्णता का अतिरिक्त होता है समावेश
आदर्श उच्च विद्यालय योगापट्टी के रसायन विज्ञान के अध्यापक अशोक सुधांशु के मुताबिक, कार्बाइड व केमिकल को जब पानी में मिलाएंगे, तो उसमें से हीट निकलती है. इससे जिस गैस का निर्माण होता है. उससे लोहा कटिंग इत्यादि का काम लिया जाता है. जब किसी केले के गुच्छे को ऐसे केमिकल युक्त पानी में डूबाया जाता है, तब उष्णता केलों में उतरती है. केले कुछ ही मिनट में पक जाते हैं. इस प्रक्रिया को उपयोग करने वाले लोग मजदूर तबके के होते हैं. उन्हें पता ही नहीं होता कि किस मात्रा के केलों के लिए कितने तादाद में इस केमिकल का उपयोग करना है. वह इसका इतना प्रयोग कर जाते हैं, जिससे केलों में अतिरिक्त उष्णता का समावेश हो जाता है, जो खाने वाले के पेट में जाता है.
दुर्गापूजा में मांग को देखते हुए 95 फीसदी कार्बाइड व केमिकल से पका केला बिक
रहा है बाजार में
मोटा लाभ कमाने के चक्कर में फल व्यवसायी आमलोगों को खिला रहे हैं केले के नाम पर जहर
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