लिट्टी-चोखा का महाप्रसाद ग्रहण कर चरित्रवन में गुजरी पंचकोसी की आखिरी रात

Published by :AMLESH PRASAD
Published at :13 Nov 2025 10:34 PM (IST)
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लिट्टी-चोखा का महाप्रसाद ग्रहण कर चरित्रवन में गुजरी पंचकोसी की आखिरी रात

पंचकोसी के अंतिम दिन गुरुवार को परिक्रमा का जत्था महर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि चरित्रवन पहुंचा.

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बक्सर. पंचकोसी के अंतिम दिन गुरुवार को परिक्रमा का जत्था महर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि चरित्रवन पहुंचा. वहां श्रद्धालुओं ने गंगा स्नान किया और मंदिरों में देवी-देवताओं के दर्शन-पूजन कर लिट्टी चोखा पकाये और भगवान को भोग लगाकर प्रसाद के रूप में स्वाद चखे. फिर प्रभु श्रीराम को याद करते हुए भजन-कीर्तन के बीच रात गुजारे. लिट्टी-चोखा के महाभोज के साथ विगत पांच दिनों से चल रही पंचकोसी परिक्रमा का सामापन हो गया, एक दिन पूर्व बुधवार को उद्दालक आश्रम बड़का नुआंव स्थित अंजनी सरीवर पर चौथा पड़ाव था. वहां रात गुजारने के बाद पंचकोसी का जत्था तड़के चरित्रवन स्थित पांचवें विश्राम स्थल पर पहुंचने के साथ ही पंचकोसी यात्री उत्तरायणी गंगा में डुबकी लगाए और श्रीलक्ष्मीनारायण भगवान समेत अन्य देवी-देवताओं का दर्शन-पूजन किये. पूजा-पाठ व दान-पुण्य के बाद उपले की अंगीठी पर लिट्टी व चोखा बनाए. सड़क से लेकर मैदान तक लगी रही भीड़ : पंचकोसी के लिट्टी-चोखा का महा प्रसाद पकाने के लिए चरित्रवन के अलावा शहर के अन्य हिस्सों में लोग जुटे हुए थे. इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सड़क से लेकर हर खाली परिसर में लिट्टियां सेंकी जा रही थीं. जिससे चप्पे-चप्पे से धुंआ निकल रहा था और आंख खोलना मुश्किल हो गया था. आलम यह था कि जिसे जहां खाली जगह मिला उनकी अंगीठी बही सज गयी थी. चरित्रवन इलाके की सड़क की पगडंडियों से लेकर शायद ही कोई ऐसी गलियां हो जहां गोइंठा की अंगीठी नहीं सुलग रही थीं. नजारा यह था कि एक अंगीठी बुझी नहीं कि उसी जगह दूसरी की तैयारी शुरू हो जा रही थी. इसको लेकर किला मैदान से लेकर सोमेश्वर स्थान तक पूरा चरित्रवन इलाका अंगिठियों की आंच से सुलग रहा था. सुबह से लेकर रात तक चला सिलसिला : लिट्टी-चोखा पकाकर खाने व खिलाने का यह सिलसिला अल सुबह प्रारंभ हुआ तो देर रात तक चला. सिद्धाश्रम पंचकोसी परिक्रमा समिति के तत्वावधान में चरित्रवन स्थित श्रीनिवास मंदिर परिसर में बसांव पीठाधीश्वर श्री अच्युत प्रपन्नाचार्य जी महाराज की अध्यक्षता में संत समागम का आयोजन हुआ. जिसमें विभिन्न पीठों के धर्माचार्य शामिल हुए और पंचकोसी परिक्रमा के आध्यात्मिक व सांस्कृतिक महत्व का वर्णन किए. कथा प्रवचन में लक्ष्मी नारायण मंदिर के पीठाधीश्वर राजगोपालाचार्य त्यागी जी महाराज, श्रीनिवासी मठिया के पीठाधीश्वर स्वामी दारामोदराचार्य जी महाराज, अहिरौली स्थित वरदराज मंदिर के महंत श्री मधुसूदनाचार्य जी, घरवांसडीह के उतराधिकारी, उतर प्रदेश रेवतीपुर के स्वामी दामोदराचार्य जी महाराज, काशी से पहुंचे हयग्रिवाचार्य जी, बसांव के कुलशेखराचार्य जी व सुदर्शनाचार्य उर्फ भोला बाबा के अलावा समिति के सचिव डॉ रामनाथ ओझा एवं संयुक्त सचिव व वरिष्ठ अधिवक्ता सूबेदार पांडेय समेत शामिल रहे. परिक्रमा से होता है आत्मउद्धार : मान्यता के अनुसार प्रभु श्रीराम त्रेता युग में पांच जगहों पर परिक्रमा किए थे. तभी से शुरू पंचकोसी परिक्रमा की परंपरा अभी तक अनवरत जारी है. सतों का मानना है कि सृष्टि के मंगल और आत्म उद्धार के लिए यह परिक्रमा की जाती है. मार्गशीर्ष माह में कृरुण पक्ष की पंचमी तिथि से शुरू होकर नवमी तिथि को यह परिक्रमा बासर के चरित्र वन में संपन्न होती है. जबकि पहले दिन अहिल्या धाम अहिरौली से शुरू होकर दूसरे दिन नारद आश्रम नदांच, तीसरे दिन भार्गव आश्रम भभुअर एवं चौथे दिन उद्दालक आश्रम नुआंव में पहुंचा था. जहा अलग-अलग व्यंजनों के भोग लगाकर श्रद्धालु रात्रि विश्राम किये थे.

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