पगडंडियों के सहारे विद्यालय जाते हैं छात्र
Updated at : 22 Jul 2017 10:02 AM (IST)
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डुमरांव : शिक्षा का बेहतर व्यवस्था को लेकर बिहार सरकार जहां लगातार प्रयासरत है. वहीं, प्रखंड के विद्यालयों में कुव्यवस्था देखने को मिल ही जाता है. कहीं, बच्चों की संख्या के अनुपात में शिक्षक नहीं, कहीं विद्यालय का चहारदीवारी क्षतिग्रस्त, तो कहीं शौचालय नदारद और भी कई समस्याएं. लेकिन, अनुमंडल कार्यालय के महज दो सौ […]
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डुमरांव : शिक्षा का बेहतर व्यवस्था को लेकर बिहार सरकार जहां लगातार प्रयासरत है. वहीं, प्रखंड के विद्यालयों में कुव्यवस्था देखने को मिल ही जाता है. कहीं, बच्चों की संख्या के अनुपात में शिक्षक नहीं, कहीं विद्यालय का चहारदीवारी क्षतिग्रस्त, तो कहीं शौचालय नदारद और भी कई समस्याएं. लेकिन, अनुमंडल कार्यालय के महज दो सौ गंज दूरी पर स्थित चतुरशालगंज प्राथमिक विद्यालय में जाने के लिए रास्ता नहीं है.
पठन-पाठन के लिए भवन चकाचक, शौचालय, पेयजल और रसाइघर से लेकर बच्चों के लिए खेलकूद तक की बेहतर व्यवस्था है, लेकिन रास्ते के अभाव में बच्चे खेत की पगडंडियों से होकर लंबी दूरी तय कर विद्यालय पहुंचते हैं. विद्यालय में पहले चतुरशालगंज के बच्चे खेत से होकर जल्दी-जल्दी पहुंच जाते थे, लेकिन समीप के खेत मालिक ने चारों तरफ ब्लेड चार लगाने से छात्र-छात्राएं अनुमंडल कार्यालय होते हुए लंबी दूरी तय कर विद्यालय पहुंचते हैं. जिस रास्ते से बच्चे स्कूल पहुंचते थे वह रास्ता भी आम रास्ता नहीं है. खेत मालिक पर निर्भर रहता है. अगर यह भी खेत मालिक चारों ओर से घेराबंदी कर दें, तो बच्चों के साथ गुरुजनों को भी आवागमन के लिए सोचना पड़ेगा. विद्यालय की स्थापना सन 2007-08 में हुआ.
विद्यालय पहले चतुरशालगंज में चलता था, लेकिन गांव के बाहर जगह मिला. जनवरी 2011 में विद्यालय का अपना चकाचक भवन मिला. विद्यालय में छात्र-छात्राओं की संख्या कुल 73 है. जबकि गुरुजनों की संख्या प्रधानाध्यापक सहित दो है. एमडीएम को लेकर रसोइघर व रसोइया मौजूद है. विद्यालय प्रबंधन ने बताया कि रास्ते को लेकर तीन-चार बार नापी हुआ, लेकिन आज तक विद्यालय को आवागमन के लिए अपना रास्ता नहीं मिला. आसपास खेत मालिक व प्रबंधन में हमेशा नोकझोंक होती रहती है. क्योंकि बच्चे विद्यालय के बाहर खेलते हैं और कुछ-न-कुछ नुकसान दूसरा करता है और नोकझोंक विद्यालय प्रबंधन से होती है. विद्यालय में निर्माणाधीन शौचालय सुरक्षित रहे. इसके लिए उसमें ताला लटका रहता है. विद्यालय समय पर विद्यालय परिसर में कोई नजर नहीं आता है.
जबकि विद्यालय चतुरशालगंज के एकदम किनारे अवस्थित है, जिससे विद्यालय बंद होने के बाद चहारदीवारी फांद असामाजिक तत्वों का बसेरा बन जाता है. कभी-कभी ये लोग शौचालय, पेयजल के लिए लगे चापाकल को कई बार नुकसान पहुंचा चुके हैं. चापाकल खराब होने पर सबसे बड़ी समस्या पेयजल व एमडीएम बनाने के लिए होती है. लंबी दूरी तय कर पानी विद्यालय में लाना पड़ता है.
बारिश के बाद होती है फजीहत
बरसात का मौसम शुरू है. विद्यालय में जाने के लिए मात्र खेत की पगडंडियां ही सहारा हैं. इसमें भी बारिश हो जाने पर छात्र-छात्राओं सहित गुरुजनों को आवागमन में फजीहत का सामना करना पड़ता है. विद्यालय में पहले बच्चे व गुरुजन खेत से होकर विद्यालय में कम समय में पहुंच जाते थे, लेकिन खेत को कटीले तार से चारों से घेराबंदी कर दिया गया जिससे अब यह रास्ता बंद है.
विद्यालय में नहीं है बिजली की व्यवस्था : चतुरशालगंज प्राथमिक विद्यालय अनुमंडल मुख्यालय से महज दो सौ गंज दूरी पर स्थित है, लेकिन विद्यालय में बिजली की व्यवस्था नहीं है, जिससे बच्चों के साथ गुरुजन में गरमी और बरसात में पसीने से तर होते दिखते हैं. गरमी से निजात को लेकर बच्चों को विद्यालय के बरामदे में पठन-पाठन होता है, जिससे राहत मिलती है. बावजूद गुरुजन हाथ में बांस से बना पंखा हाथ में लेना नहीं भुलते हैं.
पइन हो रास्ते में तब्दील, तो होगा आवागमन का रास्ता : विद्यालय परिसर के बाहर अनुमंडल मुख्यालय व चतुरशालगंज पथ पर पहुंचने के लिए पइन को रास्ता बना दिया जाये, तो बच्चों सहित गुरुजनों को आवागमन के लिए बेहतर रास्ता मिलेगा. इसके अलावा इस पथ के दोनों किनारे की खेतिहर जमीन का भाव बढ़ेगा, लेकिन यह टेढ़ी खीर होगी. बहरहाल विद्यालय के समीप से गुजरनेवाले पइन का कोई महत्व नहीं रह गया. खेतों में पानी पहुंचाने में अनुपयोग साबित हो गया. पइन को रास्ते में तब्दील करने पर काफी विद्यालय प्रबंधन को राहत मिलेगी.
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