12 करोड़ से बना अस्पताल बदहाली का शिकार, कभी बिहार-झारखंड का आधुनिक अस्पताल, आज सन्नाटे और उपेक्षा का गवाह
अस्पताल की तस्वीर
Bihar Sharif News : 2 करोड़ से बना बीड़ी श्रमिक अस्पताल बदहाली का शिकार, कभी था बिहार-झारखंड के मजदूरों की जीवनरेखा. नीचे पढ़िए पूरी खबर.
बिहारशरीफ से कंचन कुमार की रिपोर्ट
Bihar Sharif News : कभी बिहार और झारखंड के बीड़ी श्रमिकों, खनन, लौह एवं माइका उद्योग से जुड़े मजदूरों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का प्रमुख केंद्र रहा बिहारशरीफ का बीड़ी श्रमिक अस्पताल आज खुद बदहाली का शिकार हो गया है. करीब 22 वर्ष पूर्व 12 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित यह 30 बेड का अस्पताल आज संसाधनों की कमी, प्रशासनिक उपेक्षा और रखरखाव के अभाव में अपनी पहचान खोता जा रहा है. शहर से लगभग तीन किलोमीटर दूर वियावानी क्षेत्र में पांच से सात बीघा भूमि पर बने इस अस्पताल को कभी बिहार-झारखंड के सबसे आधुनिक अस्पतालों में गिना जाता था. यहां चंडीगढ़ से मंगाई गई लगभग एक करोड़ रुपये की अत्याधुनिक एक्स-रे मशीन स्थापित की गई थी. लेकिन समय के साथ सुविधाओं के अभाव और सरकारी उदासीनता ने इस अस्पताल की स्थिति दयनीय बना दी है.
कोरोना से पहले रोज आते थे 200 से 300 मरीज
स्थानीय लोगों के अनुसार कोरोना महामारी से पहले अस्पताल में प्रतिदिन 200 से 300 मरीज इलाज कराने पहुंचते थे. कोरोना काल में अस्पताल को कोविड सेंटर बनाया गया था और उस दौरान इसने संक्रमित मरीजों के उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. लेकिन कोविड काल समाप्त होने के बाद अस्पताल की व्यवस्था लगातार कमजोर होती चली गई. वर्तमान स्थिति यह है कि अस्पताल में प्रतिदिन केवल 10 से 20 मरीज ही पहुंच रहे हैं. अस्पताल में दवाओं की उपलब्धता होने के बावजूद जांच की आधुनिक मशीनें, एंबुलेंस और शुद्ध पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव मरीजों को यहां आने से रोक रहा है.
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चोरी और तोड़फोड़ से बढ़ी परेशानी
कोविड सेंटर समाप्त होने के बाद अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था भी प्रभावित हुई. देखरेख के अभाव में अस्पताल परिसर असामाजिक तत्वों का अड्डा बन गया. दो बार चोरों ने अस्पताल में चोरी की घटनाओं को अंजाम दिया और लाखों रुपये के सामान उठा ले गए. नाइट गार्ड की अनुपस्थिति का फायदा उठाकर असामाजिक तत्वों ने अस्पताल की कई खिड़कियां तोड़ दीं तथा परिसर में लगी लाइटों को भी क्षतिग्रस्त कर दिया. इससे अस्पताल की सुरक्षा और अधिक कमजोर हो गई.
जंगल में तब्दील हो रहा परिसर
अस्पताल परिसर का लगभग आधा हिस्सा झाड़ियों और जंगल में तब्दील हो चुका है. घनी झाड़ियों के कारण परिसर में सांप और बिच्छुओं का बसेरा बनने लगा है. स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्तमान में दिन के समय भी लोग अकेले अस्पताल परिसर में जाने से डरते हैं. चार वर्ष पूर्व आई बाढ़ ने भी अस्पताल को भारी नुकसान पहुंचाया था. बाढ़ का पानी पूरे अस्पताल परिसर में प्रवेश कर गया था, जिससे कई मशीनें, बेड और दरवाजे क्षतिग्रस्त हो गए. नदी किनारे स्थित अस्पताल की चहारदीवारी भी ढह गई थी, जिसकी अब तक मरम्मत नहीं कराई जा सकी है.
बायो-मेडिकल वेस्ट निस्तारण संयंत्र भी हुआ बेकार
बीड़ी श्रमिक अस्पताल की एक बड़ी विशेषता यह थी कि यहां जिले का एकमात्र हाईटेक इंडक्शन पायरोलिसिस इंसीनरेटर संयंत्र स्थापित किया गया था, जिसके माध्यम से बायो-मेडिकल वेस्ट का निस्तारण किया जाता था. लेकिन रखरखाव के अभाव में यह अत्याधुनिक मशीन भी अब लगभग निष्क्रिय हो चुकी है और बर्बादी के कगार पर पहुंच गई है.
20 स्वीकृत पदों के विरुद्ध केवल 15 कर्मी तैनात
अस्पताल में चिकित्सकों और कर्मचारियों की भी भारी कमी है. छह डॉक्टरों के स्वीकृत पदों के विरुद्ध केवल दो डॉक्टर कार्यरत हैं. कुल 20 स्वीकृत पदों के मुकाबले मात्र 15 कर्मचारी ही सेवाएं दे रहे हैं. अस्पताल परिसर में डॉक्टरों और कर्मचारियों के लिए आवासीय क्वार्टर भी बने हुए हैं, लेकिन वहां भी पानी और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है.
निर्माण के बाद भी पानी की टंकी नहीं आई उपयोग में
अस्पताल निर्माण के दौरान लाखों रुपये की लागत से एक विशाल जलमीनार (पानी टंकी) बनाई गई थी. लेकिन विडंबना यह है कि निर्माण के बाद से आज तक इस टंकी से नियमित जलापूर्ति शुरू नहीं हो सकी.
रखरखाव और सफाई के अभाव में यह टंकी धीरे-धीरे अनुपयोगी होती चली गई और करोड़ों की परियोजना का हिस्सा होने के बावजूद इसका लाभ अस्पताल को नहीं मिल सका.
जार्ज फर्नांडीस की महत्वाकांक्षी परियोजना थी अस्पताल
वर्ष 2004 में इस अस्पताल की आधारशिला तत्कालीन रक्षा मंत्री एवं नालंदा सांसद जार्ज फर्नांडीस ने रखी थी. स्थानीय बुजुर्ग आज भी इसे उनकी बड़ी उपलब्धियों में गिनते हैं. लोगों का कहना है कि जार्ज फर्नांडीस ने बिहारशरीफ को आधुनिक सुविधाओं से युक्त शहर बनाने का सपना देखा था और बीड़ी श्रमिक अस्पताल उसी सोच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था. लेकिन समय के साथ यह संस्थान अपनी पहचान खोता चला गया.
2014 के बाद घटने लगी अस्पताल की अहमियत
जानकारों का मानना है कि वर्ष 2014 के बाद बीड़ी श्रमिक अस्पताल की उपयोगिता तेजी से कम होने लगी. इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं. बीड़ी उद्योग से जुड़े श्रमिकों की संख्या में लगातार कमी, बीड़ी उत्पादन पर जीएसटी का प्रभाव, आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का विस्तार तथा गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए अन्य अस्पतालों में रेफरल सुविधा उपलब्ध होना प्रमुख कारण हैं. इसके चलते बीड़ी श्रमिक और उनके परिवार अब अन्य अस्पतालों का रुख करने लगे हैं, जिससे यहां मरीजों की संख्या लगातार घटती जा रही है.
क्या कहते हैं अस्पताल के मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी
बीड़ी श्रमिक अस्पताल के मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी पी.के. दास ने बताया कि वर्तमान में मरीजों की संख्या के अनुरूप दवाएं उपलब्ध हैं. अस्पताल की आवश्यकताओं और संसाधनों की मांग को लेकर समय-समय पर संबंधित विभाग और उच्च अधिकारियों को पत्र भेजा जाता रहा है. उन्होंने कहा कि कोरोना काल के बाद मरीजों की संख्या में काफी गिरावट आई है. अस्पताल की समस्याओं के समाधान और आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता के लिए फिर से संबंधित अधिकारियों को लिखा जाएगा.
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