नालंदा की खेती में बड़ा बदलाव, ज्वार-बाजरा से दूरी बढ़ी, धान-गेहूं बना किसानों की पहली पसंद

Edited by YUVRAJ RATAN
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प्रतीकात्मक तस्वीर

Bihar Sharif News : मडुआ से कुटकी तक: नालंदा में विलुप्ति की ओर पारंपरिक फसलें. नीचे पढ़िए आखिर नालंदा में कैसे विलुप्त हो रही यह कृषि परंपरा.

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बिहारशरीफ से कंचन कुमार की रिपोर्ट
Bihar Sharif News : कृषि प्रधान नालंदा जिले में खेती का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. करीब दो लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि और सात लाख से अधिक परिवारों की आजीविका खेती पर निर्भर होने के बावजूद मोटे अनाजों की खेती लगातार सिमटती जा रही है. ज्वार, बाजरा, रागी (मडुआ), जौ, कोदो, सामा, सांवा, कुटकी, कांगनी और चीना जैसी पारंपरिक फसलें अब किसानों की प्राथमिकता से बाहर होती जा रही हैं. उनकी जगह धान, गेहूं, दलहन, तेलहन और सब्जियों की खेती ने ले ली है.

दो लाख हेक्टेयर भूमि, सात लाख से अधिक परिवार खेती पर निर्भर

जिले में दो लाख हेक्टेयर से अधिक कृषि योग्य भूमि है. इन्हीं खेतों पर करीब 7 लाख 3 हजार 450 परिवारों की आजीविका टिकी हुई है. इनमें 3 लाख 23 हजार 324 कृषक परिवार और 3 लाख 80 हजार 126 कृषक मजदूर परिवार शामिल हैं. यानी जिले की बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती पर निर्भर है. इसके बावजूद खेती का स्वरूप तेजी से व्यवसायिक होता जा रहा है. किसान अब ऐसी फसलों की ओर झुक रहे हैं जिनसे कम समय में अधिक आमदनी हो सके. यही कारण है कि मोटे अनाजों की खेती लगातार घट रही है.

लक्ष्य बड़ा, बुआई बेहद कम

कृषि विभाग के आंकड़े बताते हैं कि मोटे अनाजों की खेती को लेकर किसानों की रुचि लगातार कम हो रही है. पिछले सीजन में जिले में 4 हजार हेक्टेयर में मक्का की खेती का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन अब तक मात्र 446 हेक्टेयर में ही मक्का की बुआई हो सकी है. इसी प्रकार जौ की खेती के लिए 500 हेक्टेयर का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, लेकिन केवल 73.85 हेक्टेयर भूमि में ही इसकी बुआई हुई है. ज्वार, बाजरा, रागी, कोदो, सामा, सांवा, कुटकी, कांगनी और चीना जैसी अन्य मोटे अनाजों की खेती लगभग नगण्य हो चुकी है.

धान-गेहूं और सब्जियों ने ली मोटे अनाजों की जगह

दो से तीन दशक पहले नालंदा के किसान अपनी जरूरत के लगभग सभी खाद्यान्न स्वयं पैदा करते थे. खेतों में धान, गेहूं के साथ-साथ ज्वार, बाजरा, मडुआ और अन्य मोटे अनाजों की खेती भी बड़े पैमाने पर होती थी. लेकिन अब किसान आर्थिक लाभ को प्राथमिकता दे रहे हैं. आलू, प्याज, टमाटर और अन्य सब्जियों की खेती किसानों की आय का प्रमुख स्रोत बन गई है. वहीं धान, गेहूं, दलहन और तेलहन की खेती घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए की जा रही है. परिणामस्वरूप मोटे अनाज खेती की मुख्यधारा से बाहर होते जा रहे हैं.

कम पानी में तैयार होने वाली फसलें भी किसानों को नहीं लुभा रहीं

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार मोटे अनाजों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनके उत्पादन में धान और गेहूं की तुलना में काफी कम पानी की आवश्यकता होती है. कम उपजाऊ भूमि में भी इनकी अच्छी पैदावार हो जाती है. इसके अलावा रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की जरूरत भी अपेक्षाकृत कम पड़ती है. जलवायु परिवर्तन और गिरते भूजल स्तर के दौर में ये फसलें किसानों के लिए बेहतर विकल्प साबित हो सकती हैं, लेकिन बाजार और लाभ के समीकरण ने किसानों को इनसे दूर कर दिया है.

मौसम की मार और बाजार की मजबूरी

कृषि विभाग के जिला परामर्शी कुमार किशोर नंदा बताते हैं कि मोटे अनाजों की खेती में किसानों की रुचि घटने के पीछे कई कारण हैं. बेमौसम बारिश, असमय तापमान में उतार-चढ़ाव और लंबी अवधि वाली खेती किसानों को हतोत्साहित कर रही है. कई बार तैयार फसल में दाना नहीं आने की समस्या भी सामने आती है. वहीं दूसरी ओर सब्जियां और नकदी फसलें कम समय में तैयार होकर बेहतर मुनाफा देती हैं. इसलिए किसान जोखिम वाली खेती से बचना चाहते हैं.

दुनिया में बढ़ रही मांग, जिले में घट रही खेती

बेन प्रखंड के बभनियावां गांव निवासी अर्जुन प्रसाद, रहुई के अनील प्रसाद आदि विशेषज्ञों का कहना है कि जिस समय नालंदा में मोटे अनाजों की खेती घट रही है, उसी समय देश और दुनिया में इनकी मांग तेजी से बढ़ रही है. स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ने के साथ ही मिलेट आधारित खाद्य पदार्थों की खपत लगातार बढ़ रही है. हरनौत कृषि विज्ञान केंद्र के प्रधान कृषि वैज्ञानिक- डॉ. सीमा कुमारी के अनुसार नालंदा में मक्का, ज्वार, बाजरा, रागी, जौ, कोदो, सामा, सांवा, कुटकी, कांगनी और चीना की खेती की अपार संभावनाएं हैं. किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज, आधुनिक तकनीक और बाजार उपलब्ध कराया जाए तो मोटे अनाजों का रकबा तेजी से बढ़ सकता है.

खेती बची तो लौटेगी पुरानी पहचान

कभी देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन में लगभग 40 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले मोटे अनाज आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं. नालंदा जैसे कृषि प्रधान जिले में इनकी खेती का लगातार घटना भविष्य की खाद्य सुरक्षा और पोषण दोनों के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते किसानों को प्रोत्साहन, तकनीकी सहायता और बेहतर बाजार उपलब्ध नहीं कराया गया तो आने वाले वर्षों में मोटे अनाज केवल किताबों और शोध पत्रों तक सीमित होकर रह जाएंगे.

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