पाट की खेती करके खर्च भी नहीं निकाल पा रहे किसान, लागत बढ़ने से हैं परेशान

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पश्चिम बंगाल में बारिश की कमी और बढ़ती लागत के कारण पाट की खेती किसानों के लिए घाटे का सौदा बन गयी है. जूट का उचित दाम न मिलने से किसान आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं.

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पूर्व बर्धमान जिले में पाट की खेती करने वाले किसानों को घाटा हो रहा है. बारिश की कमी के कारण पाट को सड़ाने के लिए कृत्रिम रूप से खेतों में व्यवस्था की जा रही है, जिससे लागत बढ़ गयी है. किसान असदुल शेख ने बताया कि बारिश नहीं हो रही है. नहर व पोखरों में पानी नहीं है. खेत में गड्ढा बनाकर पानी खरीदकर पाट को सड़ाना पड़ रहा है. इससे लागत काफी बढ़ गयी है. लागत के आधार पर जूट का पैसा नहीं मिल रहा है.

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असदुल शेख कहते हैं कि एक क्विंटल जूट की कीमत 7 से 8 हजार रुपए है. इसे तैयार करने का खर्च करीब 10 हजार रुपए आ रहा है. पाट की खेती करके मुनाफा तो दूर, घर से पैसा लगाना पड़ रहा है. बाजार में जूट का उचित दाम नहीं मिल रहा है. ऐसे में किसान पूरी तरह से बेबस हैं. उनका कहना है कि साल भर मेहनत करने के बाद भी जूट का वाजिब दाम न मिलने और पानी संकट के कारण बढ़ी लागत से नादनघाट के किसान परिवारों का भविष्य अनिश्चित हो गया है. स्थानीय किसानों की नजर अब सरकारी मदद और राहत पर टिकी है.

गौरतलब है कि इस बार पर्याप्त बारिश न होने से नादनघाट थाना क्षेत्र के मनमोहनपुर, किशोरगंज इलाके में पाट की खेती करने वाले किसान भारी मुसीबत में हैं. पानी के अभाव में किसान गहरे नलकूपों से पैसे देकर पानी खरीदने और खेतों में ही छोटे-छोटे गड्ढे बनाकर पाट का सड़ा रहे हैं. इससे खेती की लागत काफी बढ़ गयी है, जिससे किसानों को इस साल भारी आर्थिक नुकसान का डर सता रहा है.

मानसून की पर्याप्त बारिश न होने से खेत-खलिहान और पोखर खाली पड़े हैं. पाट की कटाई शुरू हो चुकी है और कटने के बाद ही उसे पानी में सड़ने के लिए छोड़ा जाता है, जिसके बाद उससे जूट तैयार होता है. लेकिन पाट सड़ाने के लिए पानी नहीं है. पानी की कमी को देखते हुए किसान अपनी ही जमीनों पर मिट्टी खोदकर छोटे-छोटे गड्ढे बना रहे हैं. उन कृत्रिम गड्ढों में पैसे देकर नलकूपों से पानी भरा जा रहा है. इससे प्रति बीघा उत्पादन लागत में अचानक काफी बढ़ोतरी हो गयी है.

श्री शेख ने बताया कि वर्तमान में खेत-मजदूरों की मजदूरी, खाद और पानी खरीदने की लागत निकालने के बाद जूट बेचकर मूलधन भी वापस नहीं मिल रहा, सिर्फ घाटा ही हाथ लग रहा है. ऐसे में सरकार को इस दिशा में सोचना होगा, अन्यथा किसानों को भारी मुसीबत झेलनी होगी.


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