Bihar politics: बिहार में नीतीश कुमार की सरकार सेट...अब 2024 टारगेट !

Updated at : 10 Aug 2022 11:52 AM (IST)
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Bihar politics: बिहार में नीतीश कुमार की सरकार सेट...अब 2024 टारगेट !

बीजेपी से अलग होकर नीतीश कुमार ने एक बार फिर बहुत बड़ा दांव खेला है. अब तक मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार ने इस्तीफा दे दिया है. बुधवार की दोपहर दो बजे नीतीश कुमार फिर से आठवीं बार सीएम पद की शपथ लेंगे.

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बिहार में बीजेपी से अलग होकर नीतीश कुमार ने एक बार फिर बहुत बड़ा दांव खेला है. अब तक मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार ने इस्तीफा दे दिया है. बुधवार की दोपहर दो बजे नीतीश कुमार फिर से आठवीं बार सीएम पद की शपथ लेंगे. बता दें कि साल 2017 में महागठबंधन छोड़ वापस बीजेपी में शामिल होने पर तेजस्वी यादव नीतीश कुमार को पलटू चाचा कहने लगे थे. उन नीतीश कुमार के साथ डिप्टी सीएम बनने जा रहे तेजस्वी यादव ने फिर से सिर्फ चाचा कहना शुरु कर दिया है.

सेक्युलर नेता के तौर पर जाने जाते हैं नीतीश

बिहार में नीतीश कुमार ओबीसी चेहरा हैं, बीजेपी के साथ लंबा वक्त रहे लेकिन विपक्ष नेताओं के बीच सेक्युलर नेता के तौर पर स्थापित रहे हैं. महिला वोटरों की ताकत, सुशासन म़ॉडल, वंशवाद से दूर, भ्रष्टाचार के दाग नहीं. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या ये सभी तत्व नीतीश कुमार को 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष के बीच सर्वमान्य बनाकर नरेंद्र मोदी के सामने चेहरा बना पाएंगे या फिर नहीं.

17 सालों से बिहार की सत्ता के केंद्र में नीतीश

नीतीश कुमार की राजनीतिक रणनीति ने सबको चौंका दिया है. यह उनका राजनीतिक कौशल ही है कि 17 सालों से बिहार की सत्ता के केंद्र में हैं. जीतन राम मांझी के एक साल के कार्यकाल को छोड़ दें, तो नीतीश कुमार 2005 से लगातार राज्य के मुख्यमंत्री हैं. 2015 में राजद से और 2020 के विधानसभा में भाजपा से कम सीट मिलने के बावजूद दोनों ही पार्टियों ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया.

सुशासन म़ॉडल का असर

लंबे समय तक सत्ता राजनीति में रहने के बाद भी नीतीश कुमार बेदाग रहे. शायद यह छवि दूसरे राजनीतिक दलों को उन्हें अपने साथ लेने पर मजबूर भी करती रही है. दोस्त के प्रतिद्वंद्वी बनने और प्रतिद्वंद्वी के दोस्त बनने की प्रक्रिया में नीतीश कुमार समय-समय पर दोनों धाराओं की राजनीति के ‘चहेते’ रहे. बीते कई सालों की राजनीति को देखें, तो ऐसा उदाहरण नहीं मिलेगा. उनकी तारीफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी करते हैं और कांग्रेस के नेता भी. वामदल भी नीतीश कुमार को समर्थन दे रहे हैं. यही वजह है कि नीतीश की छवि के आगे उनकी पार्टी को मिलने वाली सीटों की गिनती पीछे छूट जाती है या छोड़ दी जाती है.

सबने नीतीश कुमार के चेहरे पर लड़ा चुनाव

दोनों चुनाव अलग-अलग गठबंधनों ने नीतीश कुमार के चेहरे पर लड़ा था. लिहाजा, उनकी राजनैतिक नैतिकता का तकाजा था कि चुनाव बाद के परिणाम के बाद भी नीतीश कुमार को गठबंधन का नेता बनाया जाए. नीतीश कुमार नपा-तुला बोलते हैं और समय पर माकूल प्रतिक्रियाएं देते हैं. एक ही राजनीतिक धारा से आने वाले नीतीश कुमार की 1990 में लालू प्रसाद की कार्यशैली से कई बिंदुओं पर अहसमति सामने लगी थी. यह दौर 1993-94 का था. नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद को कई खत लिखे.

अब आगे की रणनीति क्या होगी…

तेजस्वी यादव ने मंगलवार को कहा कि नीतीश कुमार देश भर में सबसे अनुभवी मुख्यमंत्री हैं. उनके कहने का आशय यही था कि नयी राजनीतिक जमीन पर बनने वाली सरकार में विकास और प्रगति के मानदंड बनाये जायेंगे. बिहार की आकांक्षाओं को पूरा करने की चुनौती कहीं अधिक होगी.

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