बिहार में जमीन सर्वे पर लगा ब्रेक, 4.6 करोड़ आवेदन अभी भी पेंडिग

Updated at : 23 Mar 2026 1:50 PM (IST)
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Bihar Bhumi

सांकेतिक तस्वीर

Bihar Bhumi: बिहार सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी 'जमीन सर्वे और डिजिटलाइजेशन' योजना अब खुद संकट में घिर गई है. 4.6 करोड़ से अधिक आवेदनों का अंबार और अधिकारियों की भारी कमी ने सरकार के दावों की हवा निकाल दी है.

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Bihar Bhumi: बिहार में जमीन रिकॉर्ड को डिजिटल और पारदर्शी बनाने की महत्वाकांक्षी योजना अब सवालों के घेरे में है. तय समयसीमा नजदीक है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे काफी पीछे दिखाई दे रही है.

राज्यभर में सर्वे, म्यूटेशन और रिकॉर्ड अपडेट की प्रक्रिया धीमी पड़ गई है, जिससे आम लोगों की परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है.

4.6 करोड़ आवेदन लंबित

बिहार में जमीन विवादों को खत्म करने और रिकॉर्ड को पारदर्शी बनाने के लिए शुरू किया गया भूमि सर्वे अब खुद विवादों और देरी के भंवर में है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राज्यभर में म्यूटेशन, सुधार और रिकॉर्ड अपडेट से जुड़े 4.6 करोड़ से अधिक आवेदन धूल फांक रहे हैं.

आलम यह है कि हर गुजरते दिन के साथ नए आवेदनों की संख्या तो बढ़ रही है, लेकिन निपटारे की रफ्तार ‘कछुआ चाल’ से भी धीमी है. अंचल कार्यालयों (CO Office) में म्यूटेशन के लिए चक्कर काट रहे आम लोगों का सब्र अब जवाब देने लगा है. भ्रष्टाचार और लेटलतीफी के बीच यह योजना अपने लक्ष्य से कोसों दूर नजर आ रही है.

अधिकारियों की कमी बनी बड़ी वजह

इस धीमी रफ्तार के पीछे की सबसे बड़ी वजह राजस्व कर्मियों और अंचल अधिकारियों (CO) की भारी कमी है. उपलब्ध अधिकारियों पर पहले से ही काम का भारी दबाव है, ऊपर से सरकार ने भूमि सर्वे के साथ ‘महादलित विकास मिशन’ और ‘भू-अभियान’ जैसी अन्य योजनाओं की जिम्मेदारी भी उन्हीं के कंधों पर डाल दी है.

कई जिलों में अधिकारी या तो अवकाश पर हैं या अन्य प्रशासनिक कार्यों में व्यस्त हैं, जिससे फाइलें महीनों तक एक ही टेबल पर रुकी रहती हैं. सरकार ने बिना पर्याप्त मैनपावर और संसाधनों के इतनी बड़ी योजना की डेडलाइन तय कर दी, जो अब एक ‘सिस्टम फेलियर’ की ओर बढ़ रही है.

गांवों में बढ़ रही परेशानी, विवाद का खतरा

इस प्रशासनिक सुस्ती का सबसे खौफनाक असर बिहार के गांवों में देखने को मिल रहा है. समय पर जमीन के कागजात और डिजिटल रिकॉर्ड न मिलने के कारण किसानों को बैंक लोन लेने और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. रिकॉर्ड अपडेट न होने से ग्रामीण इलाकों में जमीन से जुड़े आपसी विवाद और हिंसक झड़पें बढ़ गई हैं..

योजना की शुरुआत तो बड़े लक्ष्य के साथ हुई, लेकिन संसाधनों की कमी ने इसे कमजोर कर दिया. अगर जल्द सुधार नहीं किया गया, तो यह महत्वाकांक्षी योजना तय समय पर पूरी नहीं हो पाएगी और सरकार के लिए यह बड़ा झटका साबित हो सकता है.

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Pratyush Prashant

लेखक के बारे में

By Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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