बिहार में गुटबाजी में फंसी कांग्रेस, लीडरशिप पर उठे गंभीर सवाल?

मल्लिकाअर्जुन खड़गे और राहुल गांधी- फाइल फोटो
Bihar politic: बिहार में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थिति दिन-ब-दिन कमजोर होती नजर आ रही है. चुनावी हार और राज्यसभा चुनाव में सामने आए असहयोग के आरोपों ने पार्टी के भीतर छिपे संकट को उजागर कर दिया है. संगठन की निष्क्रियता और गुटबाजी ने अब पार्टी के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
Bihar politic: बिहार विधानसभा चुनावों में मिली करारी शिकस्त और राज्यसभा चुनाव में विधायकों की ‘बगावत’ ने पार्टी के भीतर ऐसा भूचाल लाया है कि अब आर-पार की जंग छिड़ गई है.
एक तरफ दिल्ली दरबार की खामोशी और दूसरी तरफ पटना की सड़कों पर गुटबाजी. आखिर बिहार कांग्रेस के इस बिखराव का असली जिम्मेदार कौन है?
हार ने खोली अंदरूनी कमजोरी की परत
पिछले विधानसभा चुनावों में खराब प्रदर्शन के बाद कांग्रेस उबर नहीं पाई है. राज्यसभा चुनाव में विधायकों के कथित असहयोग ने यह साफ कर दिया कि पार्टी के भीतर तालमेल की भारी कमी है. इन घटनाओं के बाद कार्यकर्ताओं के बीच निराशा का माहौल है और संगठनात्मक गतिविधियां पड़ गई हैं.
विधानसभा चुनावों में मिली करारी शिकस्त और राज्यसभा चुनाव में विधायकों की ‘बगावत’ ने पार्टी के भीतर ऐसा भूचाल लाया है कि अब आर-पार की जंग छिड़ गई है.
केंद्रीय नेतृत्व की प्राथमिकता में नहीं बिहार
बिहार कांग्रेस के नेताओं में सबसे बड़ी टीस इस बात की है कि केंद्रीय नेतृत्व के एजेंडे से बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्य का नाम लगभग गायब हो चुका है. राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का पूरा ध्यान पश्चिम बंगाल और असम जैसे चुनावी राज्यों पर केंद्रित है, जिसके कारण बिहार इकाई खुद को लावारिस महसूस कर रही है.
यदि आलाकमान ने समय रहते दखल नहीं दिया, तो बिहार में पार्टी का बचा-खुचा आधार भी रेत की तरह हाथ से फिसल सकता है.
संगठन की कमजोरी बनी सबसे बड़ी चुनौती
राज्यसभा चुनाव के दौरान विधायकों के कथित असहयोग ने यह साफ कर दिया है कि पार्टी के भीतर अनुशासन नाम की चीज खत्म हो चुकी है. कांग्रेस की यह दुर्दशा केवल एक हार का नतीजा नहीं है, बल्कि सालों से संगठन की अनदेखी और गुटबाजी को बढ़ावा देने का परिणाम है.
अब सवाल यह उठता है कि क्या राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे बिहार की इस जर्जर स्थिति पर ध्यान देंगे? या फिर बिहार कांग्रेस इसी तरह गुटबाजी और अनिश्चितता के दलदल में धंसती जाएगी?
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लेखक के बारे में
By Pratyush Prashant
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.
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