कांवरियों के थके कदमों का सहारा बनी लाठी, सुलतानगंज में 50 लाख तक पहुंचा कारोबार
बाबा की राह में सहारा, बाजार के लिए कमाई
श्रावणी मेले में कांवरियों की यात्रा को सुगम बनाने वाली लाठी अब एक बड़ा कारोबार बन गई है. 40-50 रुपये की लाठी से सुलतानगंज में लाखों का व्यापार हो रहा है, जो दुकानदारों के लिए रोजी-रोटी का जरिया भी है.
Sultanganj News: कांधे पर कांवर, हाथ में लाठी और जुबान पर बोल-बम. सुलतानगंज से देवघर तक इन दिनों यही तस्वीर सबसे ज्यादा दिखाई दे रही है. गंगा से जल उठाने के बाद जब कांवरिये करीब 98 किलोमीटर की पैदल यात्रा पर निकलते हैं, तो कुछ दूर चलने के बाद थकान उनके कदमों पर असर डालने लगती है. ऐसे में हाथ में पकड़ी एक साधारण सी लाठी उनके लिए बड़ा सहारा बन जाती है.
आपके शहर में
कांवरियों की इसी जरूरत ने सुलतानगंज के बाजार में एक छोटे लेकिन अहम कारोबार को बड़ी रफ्तार दे दी है. श्रावणी मेला में लाठी की बिक्री इस बार लाखों रुपये के कारोबार में बदल गयी है. स्थानीय कारोबारियों के अनुसार अब तक एक लाख से अधिक लाठियां कांवरिये खरीदकर बाबा धाम की ओर ले जा चुके हैं. 40 से 50 रुपये की औसत कीमत वाली इन लाठियों से अब तक करीब 40 से 50 लाख रुपये का कारोबार होने का अनुमान है. मेला अभी जारी है, इसलिए कारोबार का आंकड़ा और बढ़ने की उम्मीद है.
जब थकने लगते हैं कदम, लाठी बनती है सबसे बड़ा सहारा
गंगा में स्नान और जल भरने के बाद कांवरिये सुलतानगंज से देवघर की ओर अपनी यात्रा शुरू करते हैं. लंबी दूरी की इस पैदल यात्रा में शरीर का संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होता. रास्ते में चढ़ाई, पथरीले हिस्से और लगातार पैदल चलने के कारण पैरों पर दबाव बढ़ता है.
ऐसे में लाठी कांवरियों के लिए केवल एक सामान नहीं रहती. यह चलने के दौरान शरीर को सहारा देती है और थकान के समय संतुलन बनाए रखने में मदद करती है. बुजुर्ग कांवरियों और दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं में इसकी मांग खास तौर पर अधिक देखी जा रही है.
कई कांवरिये यात्रा शुरू करने से पहले ही लाठी खरीद लेते हैं. कुछ रास्ते में जरूरत महसूस होने पर इसे खरीदते हैं. यही वजह है कि सुलतानगंज से लेकर कांवरिया पथ के अलग-अलग पड़ावों तक लाठी बेचने वाले दुकानदारों की मौजूदगी दिखाई दे रही है.
रोज पांच हजार से अधिक लाठियां बिकने का दावा
लाठी कारोबारियों के अनुसार मेला के दौरान प्रतिदिन पांच हजार से अधिक लाठियों की बिक्री हो रही है. सुबह कांवरियों की यात्रा शुरू होने के साथ ही दुकानों पर खरीदारी शुरू हो जाती है. देर शाम तक इसकी बिक्री जारी रहती है.
कांवरियों की संख्या बढ़ने के साथ इसकी मांग भी बढ़ जाती है. एक ओर श्रद्धालुओं के कदम आगे बढ़ते हैं, तो दूसरी ओर दुकानदारों का कारोबार भी चलता रहता है.
सुलतानगंज में लाठी के आधा दर्जन से अधिक थोक कारोबारी हैं. वहीं खुदरा बिक्री करने वाले दुकानदारों की संख्या सौ से अधिक बतायी जाती है. कांवरिया पथ के सुईया क्षेत्र में भी लाठी की बिक्री अच्छी होती है.
40 रुपये की लाठी से लाखों का बाजार
श्रावणी मेला की अर्थव्यवस्था को समझने के लिए लाठी का कारोबार एक दिलचस्प उदाहरण है. एक लाठी की कीमत भले ही 40 से 50 रुपये के आसपास है, लेकिन हजारों-लाखों श्रद्धालुओं की जरूरत जुड़ने पर यही छोटी कीमत बड़ा बाजार तैयार कर देती है.
अब तक एक लाख से अधिक लाठियां बिकने का अनुमान है. यदि एक लाठी की औसत कीमत 40 से 50 रुपये मानी जाये, तो कारोबार करीब 40 से 50 लाख रुपये तक पहुंच चुका है.
मेला अभी जारी है. ऐसे में आने वाले दिनों में बिक्री और बढ़ सकती है. यानी कांवरियों की यात्रा जितनी आगे बढ़ेगी, इस छोटे कारोबार की कमाई भी उतनी ही बढ़ने की संभावना है.
कांवरियों की जरूरत बनी दुकानदारों की रोजी-रोटी
श्रावणी मेला में आने वाले लाखों श्रद्धालु अपने साथ कई तरह की जरूरतें लेकर चलते हैं. किसी को पूजा सामग्री चाहिए, किसी को खाने-पीने का सामान, तो किसी को यात्रा में काम आने वाली चीजें. इन छोटी-छोटी जरूरतों के आसपास ही मेले की बड़ी अर्थव्यवस्था तैयार होती है.
लाठी भी इसी अर्थव्यवस्था का हिस्सा है. कांवरिये के लिए यह यात्रा का सहारा है, जबकि दुकानदार के लिए रोजी-रोटी का जरिया. थोक कारोबारियों से लेकर छोटे खुदरा विक्रेताओं तक इससे जुड़े लोगों को मेला सीजन में अतिरिक्त कमाई का अवसर मिलता है.
सुलतानगंज से सुईया तक फैला कारोबार
लाठी की बिक्री केवल सुलतानगंज के बाजार तक सीमित नहीं है. कांवरिया पथ के अलग-अलग पड़ावों पर भी इसकी मांग बनी रहती है. सुईया क्षेत्र में लाठी बेचने वाले दुकानदारों का कारोबार भी मेला के दौरान बढ़ जाता है.
इससे साफ है कि कांवरियों की एक साधारण जरूरत यात्रा मार्ग के कई हिस्सों में स्थानीय कारोबार को गति देती है. जहां कांवरिये कुछ देर रुकते हैं, वहां लाठी समेत कई जरूरी सामान की दुकानें भी उनके लिए तैयार रहती हैं.
Sultanganj News: छोटी जरूरत, बड़ा अर्थशास्त्र
श्रावणी मेला को आम तौर पर धार्मिक आस्था और कांवर यात्रा के नजरिये से देखा जाता है. लेकिन इसके पीछे एक बड़ा स्थानीय अर्थशास्त्र भी चलता है. कांवर, पूजा सामग्री, भोजन, आवास और परिवहन के साथ ऐसी छोटी-छोटी चीजें भी इस अर्थव्यवस्था को मजबूत करती हैं, जिनके बिना लंबी यात्रा मुश्किल हो सकती है.
40 से 50 रुपये की एक लाठी इसका सबसे सरल उदाहरण है. कांवरिये के थके कदमों को सहारा देने वाली यह लाठी सुलतानगंज के बाजार के लिए भी कमाई का मजबूत सहारा बन गयी है.
बाबा धाम की ओर बढ़ते हर कदम के साथ कांवरियों की जरूरतें पूरी करने वाला यह बाजार भी आगे बढ़ रहा है. मेला समाप्त होने तक लाठी कारोबार का आंकड़ा कहां तक पहुंचता है, इस पर अब कारोबारियों की नजर है.
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में
By शुभंकर
शुभंकर,करियर की शुरुआत दिल्ली के एक पाक्षिक पत्रिका से किया. राष्ट्रीय सहारा के बाद वर्ष 2005 में प्रभात खबर से जुड़ कर लगातार 21 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं. अभी प्रभात खबर सुलतानगंज भागलपुर क्षेत्र में काम कर रहे हैं.हर पल बदलते सामाजिक घटनाक्रम पर पैनी नजर रखते हुए नए कंटेंट के साथ खबरों के लिए प्रभात खबर में अपनी सेवाएं दे रहे हैं.
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए







