bhagalpur news.नामवर सिंह राष्ट्रीय नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर के थे आलोचक
Published by : NISHI RANJAN THAKUR Updated At : 09 May 2026 10:06 PM
टीएमबीयू के पीजी हिंदी विभाग में डॉ नामवर सिंह के जन्म शताब्दी समारोह के मौके पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी शनिवार को संपन्न हो गया.
पीजी हिंदी विभाग में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न, वक्ताओं ने कहा
टीएमबीयू के पीजी हिंदी विभाग में डॉ नामवर सिंह के जन्म शताब्दी समारोह के मौके पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी शनिवार को संपन्न हो गया. मौके पर कोलकाता से आये प्रो हितेंद्र पटेल ने डॉ नामवर सिंह के व्यक्तित्व और उनके वैचारिक विकास पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि नामवर सिंह राष्ट्रीय नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर के आलोचक थे. नामवर सिंह की विशेषता थी कि वे दुनिया भर में चल रही वैचारिक हलचलों व पत्रिकाओं के माध्यम से हमेशा अपडेट रहते थे. नामवर सिंह का मानना था कि जो लोग विचारधारा की जकड़न में रहते हैं, वे समय के साथ चलने की क्षमता खो देते हैं. उन्होंने उन आलोचकों पर कटाक्ष किया, जो पुराने औजारों से वैश्वीकरण की दुनिया को समझने की कोशिश कर रहे थे.प्रश्न करने की प्रवृत्ति, असहमति व्यक्त करने का साहस होना चाहिए : प्रो योगेंद्रसत्र अध्यक्ष प्रो योगेंद्र ने आज के बदलते परिवेश में नामवर सिंह की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि प्रश्न करने की प्रवृत्ति, असहमति व्यक्त करने का साहस होना चाहिए. यह भाषा, साहित्य और समाज सबके लिए आवश्यक है. सवाल उठाने वाला समाज का हितचिंतक है. लेकिन आज उसे समाज और राष्ट्र द्रोही के रूप में प्रचारित और प्रसारित किया जाता है. ऐसा नहीं होना चाहिए. नामवर सिंह ने अपनी आलोचना में प्रश्न करने के साहस का परिचय दिया है. इससे साहित्य के केंद्र में मनुष्य की भूमिका और उजागर हुई. नामवर सिंह की जन्मशती पर उनको याद करने का मतलब उन विचारों, मूल्यों और संघर्षों को याद करना है.उन्होंने आलोचना को दूसरे दर्जे का काम मानने की धारणा को बदला : प्रो चंद्रभानु सिंहबेगूसराय से आये प्रो चंद्रभानु सिंह ने कहा कि नामवर वाचिक परंपरा के आचार्य थे. उन्होंने अपने लेखन की शुरुआत कविता से की थी. नामवर सिंह की दृष्टि केवल हिंदी तक सीमित नहीं थी, बल्कि वैश्विक थी. उन्होंने आलोचना को दूसरे दर्जे का काम मानने की धारणा को बदला. इसे एक सृजनात्मक भाषा दी.नामवर सिंह ने प्राचीन, मध्यकालीन साहित्य से ज्यादा समकालीन साहित्य को आलोचना के केंद्र में रखा : निशि रंजनकथाकार निशि रंजन ने नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि की चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने हिंदी में एक नयी परिपाटी विकसित की. इसकी वजह से कई नये रचनाकार उभर पाये. उन्होंने प्राचीन, मध्यकालीन साहित्य से ज्यादा समकालीन साहित्य को आलोचना के केंद्र में रखा. इसके कारण हिंदी साहित्य और संस्कृति का परिवेश पहले के मुकाबले ज्यादा प्रभावी हुआ.40 शोधार्थियों ने शोध पत्र की प्रस्तुति दीकार्यक्रम के दूसरे सत्र में करीब 40 शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र की प्रस्तुति दी. इसे लेकर वरिष्ठ आलोचक रविभूषण ने अध्यक्षीय टिप्पणी की. पहले सत्र का संचालन डॉ अनूप श्री विजयिनी और दूसरे सत्र का संचालन डॉ मनजीत कुमार सिंह ने किया. इस अवसर पर संगोष्ठी विषयक स्मारिका का भी लोकार्पण किया गया. इसका संपादन डॉ मनजीत कुमार सिंह ने किया. धन्यवाद ज्ञापन प्रो योगेंद्र व विभाग के अध्यक्ष डॉ शिव शंकर मंडल ने किया. मौके पर संगोष्ठी संयोजक डॉ दिव्यानंद, संवेद के संपादक किशन कालजयी, प्रो पवन कुमार सिंह, डॉ रुचि श्री सहित विभाग के शोधार्थी, छात्र-छात्राएं आदि मौजूद थे.
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