गंगा के इस पार बेबसी, उस पार उम्मीद

Author Atul Kumar
Updated:
विज्ञापन
गंगा के इस पार बेबसी, उस पार उम्मीद

सोमवार की दोपहर ठीक 12 बजे का समय था और हम बरारी गंगा घाट पर मौजूद थे. सूरज सिर पर था और गर्मी लोगों की परेशानी को और बढ़ा रही थी

विज्ञापन

भागलपुर से अतुल तिवारी की रिपोर्ट

अतुल तिवारी, भागलपुरसोमवार की दोपहर ठीक 12 बजे का समय था और हम बरारी गंगा घाट पर मौजूद थे. सूरज सिर पर था और गर्मी लोगों की परेशानी को और बढ़ा रही थी. बरारी गंगा घाट पर खड़े होकर जो दृश्य दिख रहा था, वह केवल यातायात संकट की कहानी नहीं, बल्कि लोगों की बेबसी और मजबूरी का आइना था.

घाट पर कदवा निवासी एक बुजुर्ग पिता दिनेश अपनी बीमार बेटी का हाथ थामे खड़े थे. बेटी की गोद में एक मासूम भी था. तीनों की निगाहें बार-बार गंगा की ओर उठ रही थीं. उन्हें नदी पार जाना था, लेकिन नाव मिलने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी. घाट पर मौजूद नाविक यात्रियों को ले जाने के लिए तैयार नहीं थे. इसी कारण लोग फंसे हुए थे.

बुजुर्ग पिता के चेहरे पर चिंता की गहरी लकीरें साफ दिख रही थीं. बेटी की तबीयत ठीक नहीं थी और तेज धूप में खड़े-खड़े उसकी हालत और खराब होती जा रही थी. मासूम बच्चा भी गर्मी से परेशान होकर बार-बार रो पड़ता था. पिता कभी बेटी को ढांढस बंधाते तो कभी नाव आने की आस में घाट की ओर देखने लगते. उनकी आंखों में जल्द से जल्द उस पार पहुंचने की बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी.

इसी बीच घाट के दूसरे छोर पर एक और परिवार अपनी मजबूरी से जूझ रहा था. बेंगलुरु से लंबी रेल यात्रा कर भागलपुर पहुंचे मोहम्मद इफ्तेकार अपनी आठ वर्षीय बेटी और पत्नी के साथ घाट पर बैठे थे. चेहरे पर सफर की थकान साफ झलक रही थी. उन्होंने बताया कि 36 घंटे ट्रेन में सफर करने के बाद वह भागलपुर पहुंचे, लेकिन पिछले चार घंटे से घाट पर ही फंसे हैं.

इफ्तेकार ने कहा, बस गंगा पार करने की देर है. उस पार हमारे परिजन गाड़ी लेकर इंतजार कर रहे हैं, लेकिन यहां कोई साधन नहीं मिल रहा है. उनकी बेटी बार-बार पूछ रही थी कि घर कब पहुंचेंगे, लेकिन उसके सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था.

घाट पर ऐसे दर्जनों लोग थे, जिनकी मंजिल सामने दिख रही थी, लेकिन वहां तक पहुंचने का रास्ता बंद था. कोई इलाज के लिए जा रहा था, कोई अपने घर लौटने की जल्दी में था तो कोई लंबे सफर के बाद परिवार से मिलने को बेचैन था. गंगा के इस पार खड़े लोगों की आंखों में सिर्फ एक उम्मीद थी, किसी तरह नाव मिले और वे अपनी मंजिल तक पहुंच सकें.

सोमवार की दोपहर बरारी घाट पर दिखा यह दृश्य केवल परिवहन व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि उन लोगों की पीड़ा की कहानी थी, जिनके लिए नदी पार करना उस दिन सबसे बड़ी चुनौती बन गया था.

विज्ञापन
Atul Kumar

लेखक के बारे में

By Atul Kumar

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन