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अब नार्मल डिलिवरी से अधिक सिजेरियन से होने लगा बच्चों का जन्म, पांच साल में बढ़े मामले, जानें कारण

By Prabhat Khabar Print Desk
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सांकेतिक फोटो
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संजीव,भागलपुर: पिछले पांच साल में बच्चों के जन्म में कई तब्दीली आ गयी है. इन वर्षों में प्राइवेट हॉस्पिटल में पांच प्रतिशत, तो सरकारी अस्पतालों में चार फीसदी ऑपरेशन से डिलिवरी हुई. इस बदलते ढंग की वजह अस्पतालों को होनेवाले अपेक्षाकृत अधिक फायदे, समय की बचत और रिस्क कवर से बचाव है.

आम लोगों की राय

आम लोगों का कहना है कि खासकर प्राइवेट हॉस्पिटलों में उन्हें ऑपरेशन से डिलीवरी के फायदे और नॉर्मल डिलिवरी में रिस्क पर फोकस करते हुए बताया जाता है. इस कारण वे भयभीत हो जाते हैं और ऐसे समय में लाजिमी है कि कोई भी जान के आगे पैसे की अहमियत नहीं देगा.

चिकित्सा जगत से जुड़े लोगों के तर्क

वहीं चिकित्सा जगत से जुड़े लोगों के भी अपने तर्क हैं. उनका कहना है कि आजकल लोग रिस्क नहीं चाहते. कम से कम तकलीफ को तवज्जो देते हैं. साथ ही चिकित्सकों के सामने भी ऑपरेशनल टेकनिक पर्याप्त होती है. अटेंडेंट की प्राथमिकता और उपलब्ध संसाधन के कारण ऑपरेशन से डिलिवरी के केस बढ़े हैं.

ऐसे हुआ मामले का खुलासा

भारत सरकार के केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-पांच) कराया था. इसकी वर्ष 2015-16 और 2019-20 की रिपोर्ट मंत्रालय ने जारी की है. रिपोर्ट के मुताबिक प्राइवेट हॉस्पिटलों में वर्ष 2019-20 में ऑपरेशन से डिलिवरी का प्रतिशत 33.6, जबकि 2015-16 में यह 28.7 प्रतिशत था. इसी तरह सरकारी अस्पतालों में वर्ष 2019-20 में ऑपरेशन से डिलिवरी का प्रतिशत 5.9, जबकि वर्ष 2015-16 में यह 1.8 प्रतिशत था. इस तरह देखें, तो अभी भी सरकारी अस्पतालों में सौ में पांच महिलाओं का ही बच्चे की डिलिवरी के लिए ऑपरेशन का विकल्प चुना जाता है, जबकि निजी अस्पतालों में 100 में 33 बच्चों का जन्म ऑपरेशन से होता है.

अस्पतालों में काउंसेलिंग नहीं होती

14 दिसंबर को डीएम ने सदर अस्पताल का निरीक्षण किया था. वहां भर्ती एक प्रसव महिला बीबी निगाह से डीएम ने बात की, तो पता चला कि उनके बच्चे का जन्म ऑपरेशन से हुआ है. यह उनका पांचवां प्रसव है. डीएम ने पता किया तो अस्पताल में काउंसेलिंग की कोई व्यवस्था नहीं पायी गयी. ऐसे में अटेंडेंट या प्रसव महिला की काउंसेलिंग अन्य अस्पतालों में कितनी होती होगी, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि शुरू से ही महिला व अटेंडेंट की काउंसेलिंग कर नॉर्मल डिलिवरी के उपाय बताये जाते रहें, तो ऑपरेशन की नौबत ही नहीं आयेगी.

कम बच्चे की चाहत में रिस्क नहीं चाहते गार्जियन : डॉ वर्षा

शहर की प्रतिष्ठित चिकित्सक डॉ वर्षा सिन्हा बताती हैं कि ऑपरेशन से डिलिवरी के केस बढ़े हैं, पर बहुत अधिक नहीं. आज एक या दो बच्चे ही चाहते हैं लोग. रिस्क कवर करना नहीं चाहते. डॉक्टर नॉर्मल डिलिवरी का ट्रायल करना भी चाहते हैं, तो गार्जियन मना कर देते हैं. नॉमर्ल डिलिवरी में इंतजार करना पड़ सकता है, जबकि ऑपरेशन में बहुत ही कम समय लगता है. दूसरी सबसे अहम वजह यह है कि आज कल की अधिकतर महिलाएं शारीरिक श्रम से परहेज करती हैं. झाड़ू-पोंछा से लेकर खाना पकाने तक के लिए अलग-अलग मेड सर्वेंट लोग रखने लगे हैं. इस कारण उनका वजन भी बढ़ता है और उनके होनेवाले बच्चे का भी. आजकल चार-चार किलो के बच्चे जन्म ले रहे हैं. ऐसे में नॉर्मल डिलिवरी मुश्किल हो जाती है. ऑपरेशन से डिलिवरी का सबसे बड़ा फायदा भी दिख रहा है कि इससे शिशु मृत्यु दर में काफी कमी आ गयी है.

ऑपरेशन से डिलिवरी :

2019-20 - 2015-16

प्राइवेट अस्पताल : 33.6 - 28.7

सरकारी अस्पताल : 5.9 - 1.8

Posted By :Thakur Shaktilochan

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