Bihar News: प्रशासन के लेटलतीफी से होगा बड़ा नुकसान, एक माह बाद भी नहीं खुली लीची बगान की वित्तीय निविदा

Lichi
Bihar News: सहरसा मंडल कारा की जमीन पर लीची बगान है. दरअसल फरवरी महीने के प्रारंभ में ही जेल सुपरीटेंडेंट ने अखबारों में लीची बगान की निविदा प्रकाशित करायी थी. समय पर टेक्निकल बिड खुला और 26 फरवरी को वित्तीय निविदा खुलने की तारीख निर्धारित की गई थी. लेकिन अब तक नहीं हुआ.
सहरसा. जिला प्रशासन के लेटलतीफी की इंतहा है. जिससे कई क्षेत्रों में कार्य की गति अवरुद्ध होती है और सरकार को वित्तीय नुकसान भी होता है. अब जिस निविदा के खुलने की तिथि 26 फरवरी निर्धारित की गई थी, वह एक महीने बाद भी नहीं खुल सकी है. जिला प्रशासन न तो इसका कोई कारण बता रहा है और न ही कोई नई तारीख ही मुकर्रर कर रही है.
मंडल कारा की जमीन पर लीची बगान भी प्रशासन की इसी लापरवाही का खामियाजा भुगत रहा है. दरअसल फरवरी महीने के प्रारंभ में ही जेल सुपरीटेंडेंट ने अखबारों में लीची बगान की निविदा प्रकाशित करायी थी. समय पर टेक्निकल बिड खुला और 26 फरवरी को वित्तीय निविदा खुलने की तारीख निर्धारित की गई थी. लेकिन एक महीना बीत जाने के बाद भी जिला प्रशासन इस दिशा में कोई कदम बढ़ाता नहीं दिख रहा है.
मत्स्यगंधा जलाशय और रक्तकाली चौंसठ योगिनी धाम के निर्माण के समय ही साल 1997 में तत्कालीन जिला पदाधिकारी तेज नारायण दास ने मंडल कारा से पूरब खाली और बेकार पड़ी जमीन पर लीची बगान लगाया. यहां मंडल कारा के कुल भूखंड छह बीघे में से चार बीघे पर लीची के लगभग 120 पेड़ लगे हैं. इन पेड़ों से हर साल पांच से साढ़े पांच लाख रुपये तक के लीची बिकते हैं. हर साल जेल सुपरीटेंडेंट इस बगान की बंदोबस्ती के लिए टेंडर निकालते हैं.
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अधिक बोली लगाने वालों को साल भर के लिए यह बगान सुपुर्द कर दिया जाता है. लेकिन इस साल जब पेड़ में अत्यधिक मंजर आये हैं और फल बनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. ऐसे में अब तक टेंडर का पूरा नहीं होना दुर्भाग्यपूर्ण है. जानकार बताते हैं कि लीची अथवा आम के फल को बचाने के लिए समय पर पानी व दवा के छिड़काव की जरूरत होती है. अधर में लटके टेंडर प्रक्रिया के कारण लीची की पैदावार पर प्रतिकूल असर पड़ने की संभावना दिख रही है. मिली जानकारी के अनुसार इस बार भी तीन लोगों ने टेंडर में भाग लिया है. लेकिन वित्तीय निविदा खुलने के इंतजार में वे पेड़ के मंजरों को निहार भर रहे हैं.
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