भोपाल में भागलपुर की मंजूषा कला का जलवा, राष्ट्रीय कार्यशाला में बटोरी वाहवाही
Published by : Shruti Kumari Updated At : 01 Jun 2026 11:56 AM
भागलपुर की पारंपरिक मंजूषा कला का प्रदर्शन करते कलाकार
Bhagalpur news: मंजूषा गुरु मनोज पंडित ने बताया कि बिहार की पारंपरिक मंजूषा कला अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान मजबूत कर रही है. उन्होंने कहा कि इस दिशा में कई कलाकार लगातार कार्य कर रहे हैं और नई पीढ़ी को भी इस कला से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है.
सदानीरा समाधान 2026 कार्यशाला में देशभर के कलाकारों के बीच मंजूषा कला ने खींचा ध्यान
भागलपुर से दीपक राव की रिपोर्ट:
Bhagalpur news: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में आयोजित सात दिवसीय ‘सदानीरा समाधान 2026’ पारंपरिक कला कार्यशाला में अंग क्षेत्र की लोक कला मंजूषा आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. वीर भारत न्यास एवं मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग अधिष्ठान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यशाला में देशभर के लोक कला विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं. ऐसे में बिहार की ऐतिहासिक मंजूषा कला ने अपनी विशिष्ट पहचान दर्ज कराई है.
कार्यशाला का शुभारंभ 27 मई को हुआ, जबकि इसका समापन दो जून को होगा. पर्यावरण और जल संरक्षण विषय पर आधारित इस आयोजन में देश के विभिन्न राज्यों से आए 67 लोक कला विशेषज्ञ अपनी-अपनी पारंपरिक कलाओं का प्रदर्शन कर रहे हैं. इस दौरान अंग क्षेत्र की मंजूषा कला ने कला प्रेमियों और विशेषज्ञों का विशेष ध्यान आकर्षित किया.

मंजूषा गुरु मनोज पंडित ने बताया कि बिहार की पारंपरिक मंजूषा कला अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान मजबूत कर रही है. उन्होंने कहा कि इस दिशा में कई कलाकार लगातार कार्य कर रहे हैं और नई पीढ़ी को भी इस कला से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है.
मंजूषा कला के ऐतिहासिक महत्व से कराया अवगत
कार्यशाला में मंजूषा कलाकार पवन कुमार सागर ने प्रतिभागियों को इस कला के इतिहास और सांस्कृतिक महत्व की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि मंजूषा कला का संबंध अंग क्षेत्र की प्रसिद्ध बिहुला-विषहरी लोकगाथा से है और इसे छठी शताब्दी की प्राचीन लोक कला माना जाता है.
उन्होंने कहा कि यह कला नारी सशक्तीकरण का भी सशक्त उदाहरण है. मंजूषा कला के पुनर्जागरण का दौर वर्ष 1934 में शुरू हुआ, जब तत्कालीन आईसीएस अधिकारी विलियम जॉर्ज ने इसकी खोज कर इसके चित्रों को संग्रहित किया और लंदन स्थित इंडिया हाउस में प्रदर्शित कराया.
पवन कुमार सागर ने बताया कि इस कला को परंपरागत रूप से कुम्हार और मालाकार समुदाय द्वारा संरक्षित किया गया. पहले कुम्हार समुदाय मंजूषा कलश तैयार करता था, जबकि मालाकार समुदाय मंजूषा निर्माण का कार्य करता था.
रंगों और बॉर्डर की है विशेष पहचान
मंजूषा कला में मुख्य रूप से हरा, पीला और गुलाबी रंगों का उपयोग किया जाता है. हरा रंग हरियाली और खुशहाली, पीला समृद्धि और विकास तथा गुलाबी प्रेम का प्रतीक माना जाता है.
उन्होंने बताया कि मंजूषा कला की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विशिष्ट बॉर्डर शैली है. इसमें बेलपत्र, लहरिया, त्रिभुज, मोखा और सर्प श्रृंखला जैसे पांच प्रमुख बॉर्डर बनाए जाते हैं. वहीं रेखाचित्रों को प्रमुख रूप से हरे रंग से उकेरा जाता है.
कार्यशाला में शामिल कलाकारों और कला प्रेमियों ने मंजूषा कला की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, रंग संयोजन और सांस्कृतिक महत्व की सराहना की. इससे अंग क्षेत्र की इस लोक कला को राष्ट्रीय मंच पर नई पहचान मिलने की उम्मीद बढ़ी है.
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