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रामनवमी के दिन नरदेवी मंदिर में भक्तों उमड़ी भीड़

Updated at : 06 Apr 2025 8:50 PM (IST)
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रामनवमी के दिन नरदेवी मंदिर में भक्तों उमड़ी भीड़

भारत-नेपाल सीमा पर वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के घने वन क्षेत्र में प्राचीन काल से स्थापित आस्था के महाकेंद्र नरदेवी मंदिर में नवरात्र के अवसर पर भक्त श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है.

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वाल्मीकिनगर. भारत-नेपाल सीमा पर वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के घने वन क्षेत्र में प्राचीन काल से स्थापित आस्था के महाकेंद्र नरदेवी मंदिर में नवरात्र के अवसर पर भक्त श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है. शारदीय और चैत्र नवरात्रि में सैकड़ों भक्तों की भारी भीड़ यहां प्रतिदिन उमड़ती है. बावजूद इसके सालों भर माता के दर्शन के लिए दूर दराज क्षेत्रों, पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश और नेपाल से भक्तों का तांता लगा रहता है. भक्तों का मानना है कि माता के दरबार में पहुंचने मात्र से ही उनकी मन्नत पूरी हो जाती हैं और उनके दुखों का निवारण हो जाता है. भक्तों की मानें तो पूर्व समय में मंदिर की परिक्रमा माता की सवारी बाघ द्वारा प्रतिदिन सुबह शाम की जाती थी. भक्त शाम के बाद मंदिर में भय वश जाने से गुरेज किया करते थे. आज रविवार को चैत्र नवरात्र के नवमी तिथि पर भीड़ के कारण पूजा समिति के सदस्यों को भीड़ को नियंत्रित करने में काफी मशक्कत करनी पड़ी. हालांकि पूजा स्थलों पर पुलिस की तैनाती थानाध्यक्ष संजय कुमार सिंह द्वारा की गयी थी.

नर बलि के कारण पड़ा नाम नर देवी

जानकारों की मानें तो नर देवी मंदिर का इतिहास अत्यंत प्राचीन है. इतिहास के दो वीर योद्धा आल्हा उदल द्वारा इस मंदिर की स्थापना की गयी थी. ऐसी मान्यता है कि बुंदेलखंड के राजा जासर के दो वीर और प्रतापी पुत्रों आल्हा और उदल द्वारा घने जंगल के बीच इस मंदिर में उनकी पूजा-अर्चना की जाती थी और वे श्रद्धा भाव से माता की पूजा में लीन रहा करते थे. पूजा समाप्त होने पर आल्हा ऊदल द्वारा माता के चरणों में अपने शीश की बलि दी जाती थी. किंतु माता का आशीर्वाद से उनके सर फिर जुड़ जाते थे. नर बलि के कारण मंदिर का नाम नर देवी पड़ा.

मंदिर पहुंचने वाले भक्तों की मन्नतें होती हैं पूरी

नर देवी मंदिर का इतिहास काफी पुराना है. दूर-दूर से भक्त यहां सालों भर माता के दर्शन को पहुंचते हैं. भक्तों की मान्यता है कि माता के दर्शन मात्र से उनके दुखों का निवारण हो जाता है. इस बाबत पूछे जाने पर मंदिर के पुजारी खाटू श्याम पुरी ने बताया कि आल्हा उदल द्वारा मंदिर की स्थापना की गयी थी. मंदिर की परिक्रमा बाघ द्वारा की जाती थी. परिक्रमा के बाद बाघ जंगल में वापस चला जाया करता था. किंतु कभी किसी भक्त के साथ कोई अप्रिय घटना नहीं घटी. चैत्र और शारदीय नवरात्र में वाल्मीकिनगर, हरनाटांड़ थरुहट क्षेत्र और पड़ोसी देश नेपाल के अलावा उत्तर प्रदेश से भी भारी संख्या में भक्त माता के दर्शन को यहां पहुंचते हैं.

असाध्य रोग की दवा है अमृत कुआं का पानी

ऐसी मान्यता है कि मंदिर परिसर में स्थित कुआं जिसे अमृत कुआं कहा जाता है. जिसका पानी आज भी पूरी तरह स्वच्छ और निर्मल है. जिसका सेवन करने मात्र से ही कई असाध्य रोगों से लोगों को निजात मिल जाती है. मंदिर पहुंचने वाले भक्त अमृत कुआं का पानी का सेवन करने से नहीं चूकते. इस पानी को माता का प्रसाद भी माना जाता है.

मंदिर का हुआ जीर्णोद्धार

नर देवी मंदिर का जीर्णोद्धार लगभग 6 वर्ष पूर्व जाने माने समाजसेवी स्व. हरेंद्र किशोर सिंह द्वारा किया गया. आज यह मंदिर अपनी नक्काशी, खूबसूरती और भव्य निर्माण के लिए जानी जाती है. मंदिर में आने वाली भारी भीड़ को भीड़ के कारण पर्याप्त जगह होने से परेशानियां नहीं होती हैं. मंदिर के शिखर पर अलग-अलग देवताओं की लगी मूर्तियां भक्तों और श्रद्धालुओं को भक्तिमय बना देती है.

भीड़ को नियंत्रित करते हैं पूजा समिति के सदस्य

मंदिर में होने वाली भारी भीड़ को नर देवी मंदिर पूजा समिति के सदस्य पूरी तरह नियंत्रित करते हैं. ताकि किसी भी भक्त श्रद्धालु को किसी भी प्रकार की असुविधा ना हो सके. पूजा समिति द्वारा मंदिर परिसर और उसके आसपास के क्षेत्र की साफ सफाई पर पूरा ध्यान रखा जाता है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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SATISH KUMAR is a contributor at Prabhat Khabar.

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