सावन में जाग उठती है समुद्र मंथन की अमर गाथा, मंदार पर्वत आज भी सुनाता है अमृत-विष की दिव्य कथा

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सावन में जाग उठती है समुद्र मंथन की अमर गाथा, बिहार का मंदार पर्वत आज भी सुनाता है देवताओं और अमृत की दिव्य कथा

मंदार पर्वत और पर्वत शिखर पर स्थित काशी विश्वनाथ शिवलिंग | Prabhat Khabar Network

Sawan Special : सावन का महीना जहाँ भगवान शिव की भक्ति का प्रतीक है, वहीं बिहार का मंदार पर्वत समुद्र मंथन की अमर गाथा का जीवंत साक्षी है. यहां जानें कैसे पर्वत मथनी बना और शिव बने नीलकंठ.

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Sawan Special : सावन का महीना भगवान शिव की भक्ति, तपस्या और आध्यात्मिक साधना का प्रतीक माना जाता है. इसी पावन मास में समुद्र मंथन और भगवान शिव के नीलकंठ बनने की कथा सबसे अधिक स्मरण की जाती है. धार्मिक परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार बिहार के बांका जिले में स्थित मंदार पर्वत ही वह पौराणिक मंदराचल है, जिसका उपयोग देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन के दौरान मथनी के रूप में किया था. यही मान्यता मंदार पर्वत को सनातन आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बनाती है.

जब भगवान विष्णु बने कूर्म अवतार

विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध, महाभारत के आदि पर्व तथा अन्य पुराणों में वर्णित है कि महर्षि दुर्वासा के श्राप से देवताओं का तेज और सामर्थ्य समाप्त हो गया था. तब भगवान विष्णु ने देवताओं को असुरों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करने का उपाय बताया. मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया. जब पर्वत समुद्र में डूबने लगा, तब भगवान विष्णु ने कूर्म (कच्छप) अवतार धारण कर अपनी पीठ पर पर्वत को संभाला और समुद्र मंथन सफल हुआ.

हलाहल विष और नीलकंठ महादेव की महिमा

समुद्र मंथन से सबसे पहले हलाहल विष निकला, जिसकी ज्वाला से तीनों लोक संकट में पड़ गए. सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया. विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और तभी से वे नीलकंठ महादेव के नाम से पूजे जाने लगे. सावन में भगवान शिव की विशेष पूजा का संबंध इसी प्रसंग से माना जाता है. यही वजह है कि सावन के दौरान मंदार पर्वत पर शिवभक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है.

समुद्र मंथन से निकले 14 दिव्य रत्न

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार समुद्र मंथन से 14 दिव्य रत्न प्राप्त हुए. इनमें देवी लक्ष्मी, धन्वंतरि, अमृत कलश, कौस्तुभ मणि, चंद्रमा, कामधेनु, कल्पवृक्ष, ऐरावत, उच्चैःश्रवा अश्व, वारुणी, रंभा, पारिजात, शंख सहित अन्य दिव्य रत्न शामिल हैं. देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को पति रूप में स्वीकार किया, जबकि भगवान शिव ने चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण किया. अंत में भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लेकर देवताओं को अमृत पान कराया.

आस्था, इतिहास और प्रकृति का अद्भुत संगम

मंदार पर्वत केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक महत्व के कारण भी विशेष पहचान रखता है. पर्वत पर दिखाई देने वाले नागाकार चिह्न, प्राचीन मंदिर, शिलालेख, पापहरणी सरोवर तथा भगवान विष्णु के चरणचिह्न से जुड़ी मान्यताएं इसे अद्वितीय तीर्थस्थल बनाती हैं. हर वर्ष सावन में यहां हजारों श्रद्धालु, पर्यटक और शोधकर्ता पहुंचते हैं.

सावन में क्यों करें मंदार पर्वत की यात्रा?

सावन का संदेश केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है. समुद्र मंथन की कथा संघर्ष, धैर्य, सहयोग और लोककल्याण की प्रेरणा देती है. बांका का मंदार पर्वत आज भी उसी दिव्य परंपरा का जीवंत साक्षी माना जाता है. यदि आप सनातन संस्कृति की जड़ों, समुद्र मंथन की पौराणिक गाथा और भगवान शिव के नीलकंठ स्वरूप की अनुभूति करना चाहते हैं, तो सावन में मंदार पर्वत की यात्रा एक अविस्मरणीय आध्यात्मिक अनुभव बन सकती है.

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संजीव कुमार

लेखक के बारे में

By संजीव कुमार

संजीव कुमार पाठक प्रिंट माध्यम में 18 वर्षों से और डिजिटल माध्यम में पिछले 4 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. बौंसी (बांका) क्षेत्र में काम कर रहे हैं. सामाजिक गतिविधि, खेल, इतिहास और राजनीतिक गतिविधियों की खबरों में रुचि रखते हैं.

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