1895 से स्थापित है करहरिया की दुर्गा

1895 से स्थापित है करहरिया की दुर्गा फोटो : 19 बांका 20, 21 : दुर्गा मंदिर की तस्वीर व मेडपति नवनीत, बांकाशहर स्थित करहरिया दुर्गा मंदिर का इतिहास भी वर्षों पुराना है. मां दुर्गा मंदिर के वर्तमान मेड़पति वामा चरण मित्रा बताते हैं कि हमारे पूर्वज जो वर्ष 1817 के लगभग बंगाल के मुर्सीदाबाद में […]
1895 से स्थापित है करहरिया की दुर्गा फोटो : 19 बांका 20, 21 : दुर्गा मंदिर की तस्वीर व मेडपति नवनीत, बांकाशहर स्थित करहरिया दुर्गा मंदिर का इतिहास भी वर्षों पुराना है. मां दुर्गा मंदिर के वर्तमान मेड़पति वामा चरण मित्रा बताते हैं कि हमारे पूर्वज जो वर्ष 1817 के लगभग बंगाल के मुर्सीदाबाद में रहते थे. भगवती चरण मित्रा, मदन मोहन मित्रा, गोरा चांद मित्रा, प्रेम लाल मित्रा, एवं नरसिंह मित्रा सपरिवार मां भगवती के शृंगार को मिट्टी के बरतन में लेकर भागलपुर जिला आये और रोजगार की तलाश में पूर्व के भागलपुर जिला तथा वर्तमान के बांका जिला अंतर्गत कुनौनी ग्राम आये. जहां पर इन लोगों को जमीनदार के यहां मुंशी पटवारी का काम मिला. और जमीनदार ने इनकी कार्यकुशलता से खुश होकर कुछ जमीन दान में भी दिये. इसके बाद मां भगवती मित्रा परिवार के स्वप्न में आयी और बोली की मुझे स्थान दो और मेरी अराधना करों. यदि ऐसा नहीं करोंगे तो पुत्र विहीन हो जाओगे. इसके बाद इन लोगों ने मां भगवती के श्रृंगार एवं मिट्टी के वर्तन को एक वृक्ष की डाली में लटका दिया. इससे माता संतुष्ट नहीं हुई और पुन: स्वप्न दिया कि मुझे स्थान चाहिए वृक्ष की डाली नहीं. इसके बाद मित्रा परिवार 1895 में कुनौनी से करहरिया आकर मां भगवती के श्रृंगार एवं मिट्टी के कलश को ताड़ के डमोले के घर में स्थापित कर पूजा अर्चना करने लगे. मां भगवती की दया से करहरिया में रह रहे परिवार की उन्नति को देख कर कुनौनी में रह रहे परिवार करहरिया आकर मां भगवती के श्रृंगार को उठाकर पुन: कुनौनी ले जाने लगे. लेकिन रास्ते में उन्हें लघु शंका लग गयी और वह चांदन नदी में मां दुर्गा के श्रृंगार एवं कलश को रखकर लघु शंका करने लगा. और फिर वह पुन: श्रृंगार एवं कलश को उठाने का प्रयास किया लेकिन वह हिला तक नहीं. उसके बाद कुनौनी में रह रहे परिवार करहरिया आकर यहां रह रहे परिवार को आपबीती सुनायी. उसके बाद करहरिया से शिव चरण मित्रा, गुरु चरण मित्रा, देवी चरण मित्रा सहित स्थानीय लोगों के सहयोग से पुन: मां भगवती को वापस लाकर उन्हें उसी स्थान पर स्थापित किया गया और अलिगंज के वसंती बाबू, चिलकावर अमरपुर के छेदी सिंह, बांका के कार्तिक साह सहित अन्य लोगों के सहयोग से मां भगवती के भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया. इस प्रकार चोरी छिपे मां दुर्गा के श्रृंगार को ले जाने पर कुनौनी में रह रहे परिवार को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई. उन्हें सिर्फ पुत्री की प्राप्ति हुई जिससे उनका वंश आगे नहीं बढ़ा. लेकिन करहरिया में रह रहे दिन दुगुनी तरक्की की और शिव चरण मित्रा को निवंधन कार्यालय बांका में नकल नवीश के पद पर सरकारी नौकरी प्राप्त हुई. इसके बाद देवी चरण मित्रा के संतान अनोदा चरण मित्रा एवं राधा चरण मित्रा की संतान के द्वारा आजतक मां भगवती की आराधना अनवरत जारी है.
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