न पीने का पानी, न ही सफाई

Published at :06 Oct 2015 8:33 AM (IST)
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न पीने का पानी, न ही सफाई

सुरक्षा के लिए एक चौकीदार भी नहीं रहता औरंगाबाद (ग्रामीण) : पितरों के मोक्ष की नगरी गया में पिंडदान करनेवाली पिंडदानी पुनपुन नदी में आकर जब तक पिंडदान नहीं करते हैं, तब तक पिंडदानियों के पितरों को मोक्ष नहीं मिलती. आश्विन मास के प्रथम दिन से यानी कि पितृपक्ष के 15 दिन औरंगाबाद से 15 […]

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सुरक्षा के लिए एक चौकीदार भी नहीं रहता
औरंगाबाद (ग्रामीण) : पितरों के मोक्ष की नगरी गया में पिंडदान करनेवाली पिंडदानी पुनपुन नदी में आकर जब तक पिंडदान नहीं करते हैं, तब तक पिंडदानियों के पितरों को मोक्ष नहीं मिलती. आश्विन मास के प्रथम दिन से यानी कि पितृपक्ष के 15 दिन औरंगाबाद से 15 किलोमीटर पश्चिम सिरिस गांव के समीप पुनपुन नदी पर हजारों पिंडदानी आकर पिंडदान करते हैं. यहां पर सुबह से शाम तक तीर्थयात्रियों की बसों की कतार रहती है.
पिंडदानियों से यह जगह धार्मिक स्थल के रूप में तब्दील हो जाता है. देश के कोने-कोने से पिंडदानी प्रतिदिन यहां घाट पर पिंडदान करने के लिए आ रहे हैं. लेकिन सबसे दुखद स्थिति यह है कि यहां आनेवाले पिंडदानियों के लिए कोई व्यवस्था नहीं है. न तो कोई शेड लगा है न तो पीने के पानी की व्यवस्था है.
न ही घाट पर साफ-सफाई की जाती है. यहां सुरक्षा व्यवस्था के लिए बारूण थाने की पुलिस को कौन कहे एक चौकीदार भी नहीं रहता. ये तो ऊपर वाले का शुक्र है कि अभी तक कोई अप्रिय घटना यहां पर नहीं घटी है. लेकिन इतना जरूर है कि यहां उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों से आनेवाले पिंडदानी जब कुव्यवस्था से परेशान होते हैं, तो उनके मुंह से यह निकल ही पड़ती है कि यहां प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है और यह पिंडदानियों का अपमान है. गुजरात से आये रघु किशन नामक पिंडदानी ने कहा कि पुनपुन नदी स्वर्ग की नदियों में गिनी जाती है.
पितरों का स्वर्ग में स्थान दिलाने के लिए यहां हमलोग पिंडदान करने आते हैं, लेकिन यहां की स्थिति काफी चिंताजनक है. मध्यप्रदेश के पिंडदानी व्यास गुप्ता ने कहा कि पुनपुन नदी पर पिंडदान करने के लिए जो लोग आते हैं, उन्हें काफी परेशान किया जाता है. पिंडदान कराने वाले पुजारी, पंडित सभी मनमाना पैसे वसूलते हैं. व्यवस्था कुछ भी नहीं है. ऐसे ही कई पिंडदानियों ने यहां की कुव्यवस्था पर अपनी व्यथा सुनायी.
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