वोट मांगने आने वाले नेताओं से ठोक-बजा कर सवाल दागने की तैयारी में हैं किसान

Updated at : 26 Mar 2019 8:03 AM (IST)
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वोट मांगने आने वाले नेताओं से ठोक-बजा कर सवाल दागने की तैयारी में हैं किसान

पंकज झा, अररिया : हरी अनंत हरी कथा अनंता की तर्ज पर जिले में किसानों की समस्याएं भी अंतहीन है. कड़ी धूप-बारिश व हाड़ कंपा देने वाले ठंड में खेतों में दिन रात एक कर देने के बावजूद फसलों का लागत मूल्य भी हासिल नहीं होने की पीड़ा उन्हें परेशान कर रहा है. कभी बाढ़ […]

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पंकज झा, अररिया : हरी अनंत हरी कथा अनंता की तर्ज पर जिले में किसानों की समस्याएं भी अंतहीन है. कड़ी धूप-बारिश व हाड़ कंपा देने वाले ठंड में खेतों में दिन रात एक कर देने के बावजूद फसलों का लागत मूल्य भी हासिल नहीं होने की पीड़ा उन्हें परेशान कर रहा है.
कभी बाढ़ तो कभी सुखाड़ के कारण फसल के नुकसान का दर्द उनका पीछा नहीं छोड़ रहा है. तो कृषि योजना के चक्कर में बिचौलियों के शोषण का सवाल हो या फिर बेटी-बेटियों की पढ़ाई, शादी-ब्याह, परिवार की परवरिश की जिम्मेदारी सही से नहीं निभा पाने की चिंता से उन्हें दो-चार होना पड़ रहा है.
जाहिर है इन पीड़ाओं से उपजा गुस्सा उनके सीने में उबाल मार रहा है. इसी गुस्से के साथ किसान इस बार वोट मांगने आने वाले नेताओं का इंतजार सिद्दद से कर रहे हैं.
व्यवस्था की पेचीदगियों में फंस कर दम तोड़ रहा है धान उत्पादन
धान जिले का मुख्य फसल है. सरकार द्वारा इसके खरीद पर न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रावधान है. लेकिन व्यवस्थागत पेचीदगियों में फंस कर यह सरकारी व्यवस्था भी जिले में दम तोड़ चुका है. इस व्यवस्था से बिचौलिये लाभान्वित हो रहे हैं. किसानों से धान खरीद के लिए पैक्स व व्यापार मंडल का जिम्मेदारी दी गयी है.
अब तक 3210 किसानों से ही धान खरीद हो सका है. समर्थन मूल्य पर किसानों से अनाज खरीदने के लिए क्रय केंद्र की व्यवस्था की जाती है. यह केंद्र तब खुलते हैं. जब किसान औने-पौने दाम पर अपनी फसल बेच चुके होते हैं.
क्रय केंद्र खुलने का इंतजार किसान नहीं कर सकते हैं. एक फसल कटने के बाद अगली फसल के लिए खेतों को तैयार करने से लेकर खाद, बीज व सिंचाई के मुक्कल इंतजाम के लिए पैसों की जरूरत होती है. जो तैयार फसल को बेच कर ही जुटाया जा सकता है.
घाटे का सौदा बन चुका है खेती, नहीं मिलता वाजिब दाम
फसल लागत वसूल नहीं होने के कारण जिले के किसान बेदम हो चुके हैं. उनकी आर्थिक स्थिति लगातार बदतर होते जा रही है. इसकी एक बानगी देखिये इस बार किसानों ने आलू का बीज 25 रुपये प्रति किलो के दाम खरीदा है. अब जब बेचने की बारी है. तो बाजार में प्रति किलो आलू के लिए किसानों को महज तीन से चार रुपये मिल रहे हैं.
कुसियारगांव निवासी आलू उत्पादक किसान मो तबरेज ने कहा कि पूंजी ऊपर नहीं होने के कारण खेती अब घाटा का सौदा बन चुका है. एक एकड़ में आलू की खेती में किसानों को औसतन 40 हजार रुपये खर्च करने पड़ते हैं. अमूमन एक एकड़ में 110 क्विंटल आलू का उत्पादन संभव है.
बाजार में इसे बेचने पर 30 से 35 हजार रुपये ही किसानों को मिल रहे हैं. बिक्री के लिए आलू बाजार लाने में किसानों को बड़ी रकम इसके ढुलाई, परिवहन और बोरों की खरीद पर खर्च करने पड़ते हैं. बोरों की खरीद पर ही प्रति बोरा उन्हें 25 रुपये खर्च करने पड़ते हैं.
अमूमन यही हाल मक्का उत्पादक किसानों की भी है. मक्का उत्पादक किसान पलासी निवासी देवानंद झा ने कहा कि बाजार से चार सौ रुपये प्रति किलो खरीद कर मक्का खेतों में लगाया है. जब बेचने की बारी आयेगी तो इसकी कीमत दस से बारह रुपये प्रति किलो मिलेगी.
कभी जिला जूट उत्पादन का मुख्य केंद्र था. कैश क्राप के रूप में किसान बढ़-चढ़ कर इसके उत्पादन में रूचि लेते थे. जिले में अब इसकी खेती नहीं के बराबर होती है. लागत व मूल्य का सवाल यहां भी आड़े आने के कारण जूट उत्पादन को लेकर किसानों का मोह कब के भंग हो चुका है.
कृषि आधारित उद्योग की स्थापना से होगा किसानों को फायदा
हाल के दिनों में कृषि तकनीक उन्नत हुई है. किसान पहले एक साल में एक उपज ले पाते थे. आज साल में तीन फसल लेना आसान है. इसके बावजूद किसानों लगातार नुकसान झेलना पड़ रहा है.
कृषि विशेषज्ञ दामोदर राव की मानें तो किसानों को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए उत्पादित फसल का वाजिब दाम मिलना जरूरी है. इसके लिए जिले में कृषि आधारित उद्योगों की स्थापना को बढ़ावा देने की जरूरत है. औद्योगिक तौर पर लाभकारी फसल के उप्पादन के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है. लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है.
चुनाव के वक्त किसानों की समस्या पर लंबे-लंबे भाषण दिये जाते हैं. उनके हालात में सुधार का दावा किया जाता है. भोले-भाले किसान इन दावों के भ्रम में पड़कर अपना कीमती वोट देकर प्रत्याशियों को लोकसभा व विधानसभा में प्रतिनिधित्व के लिए भेजते हैं. लेकिन चुनाव जीतने के बाद किये वादे भूल कर नेता अपना उल्लू सीधा करने की जुगत में भीड़ जाते हैं.
बहरहााल किसानों की हालत जस के तस बनी रहती है. अबकी बार किसान ऐसी गलती नहीं दोहराना चाहते. इसलिए वोट मांगने आने वाले सभी प्रत्याशियों से ठोक-बजा कर सवाल दागने का मन बना चुके हैं.
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