फुटबॉल के खेल से सोच बदल रही हैं ये बिहार की बेटियां
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 04 Jul 2019 8:40 AM
बिहार बदल रहा है और इस बदलते बिहार की पहचान बन रही हैं फुटबॉलर बेटियां. ये ऐसी बेटियां हैं जो मैदान में प्रतिद्वंद्वि खिलाड़ियों से पहले समाज से लड़ रही हैं. इन्होंने अपनी जिद से काफी हद तक अपने आस-पास के समाज के रूढ़िवादी सोच को बदलने में कामयाबी भी पा ली है. ये लंबा […]
बिहार बदल रहा है और इस बदलते बिहार की पहचान बन रही हैं फुटबॉलर बेटियां. ये ऐसी बेटियां हैं जो मैदान में प्रतिद्वंद्वि खिलाड़ियों से पहले समाज से लड़ रही हैं. इन्होंने अपनी जिद से काफी हद तक अपने आस-पास के समाज के रूढ़िवादी सोच को बदलने में कामयाबी भी पा ली है. ये लंबा सफर तय कर फुटबॉल के मैदान में पहुंचती हैं. इनमें से ज्यादातर अपनी पढ़ाई, घर के काम और कुछ तो खेत में काम करने के बाद फुटबॉल खेलने पहुंचती हैं. इन सब में जो बात कॉमन है, वह यह कि ये समाज के सबसे कमजोर तबके से आती हैं. इसके बाद भी इनके हौसले किसी से कम नहीं. ये देश और दुनिया में अपनी पहचान बनाना चाहती हैं.
शहर के अलग-अलग हिस्सों से राजधानी पटना पहुंचीं लड़कियां
शहर के अलग – अलग हिस्सों में फुटबॉल खेलने वाली ये किशोरियां बुधवार की शाम सेंट जेवियर्स कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी, दीघा में जुटीं. यहां बिहार वीमेंस स्पोर्टस प्रमोशन एसोसिएशन की ओर से फुटबॉल मैच का आयोजन किया गया. इसका नाम दिया गया था फुटबॉल फॉर वीमेन इक्विलिटी. इसमें कुल चार टीमों के बीच मैच हुए. जिसमें से दो टीम गौरव ग्रामीण महिला विकास मंच, फुलवारीशरीफ की थी इनके नाम थे साधना और निष्ठा. शेष दो टीमों में एक टीम नारी गुंजन, दानापुर की उमंग और दूसरी टीम इजाद, पटना सिटी की जोश थी. पहला मैच उमंग और जोश के बीच हुआ िजसमें उमंग जीती. जबकि दूसरा मैच साधना और निष्ठा के बीच हुआ इसमें साधना टीम विजयी हुई. कॉलेज के मैदान में बच्चियों की हौसला अफजाई के लिए पहुंचे थे विधायक शकील अहमद खान, रिटायर्ड आइएएस विजय प्रकाश, पद्मश्री सुधा वर्गीज,महिला उद्योग संघ की अध्यक्ष उषा झा, यूनिसेफ संचार विशेषज्ञ निपुर्ण गुप्ता, सेवा द चिल्ड्रेन के बिहार प्रमुख राफे एजाज हुसैन.
समाज के ताने से हारी नहीं
कुछ ऐसी ही कहानी इजाद संस्था के बैनर तले फुटबॉल खेलने वाली किशोरियों की है. इसमें से ज्यादातर लड़कियां पटना सिटी इलाके से आती है और मुस्लिम समाज से आती हैं. इनकी टीम की कैप्टन शफा परवीन बताती है कि 2014 में हमारी टीम से तीन लड़कियों को दानापुर में तीन दिनों की फुटबॉल ट्रेनिंग मिली थी. हमलोगों के लिए भी घरों से निकल कर फुटबॉल खेलना आसान नहीं था. समाज के तंज हमें भी सुनने को मिले लेकिन हमने हार नहीं मानी. लेकिन हम जिस पार्क में प्रैक्टिस करती थी कुछ महीनों बाद उसे बंद कर दिया गया. इसके बाद अगस्त 2018 में एक बार फिर से हमारी टीम बनी और हमने मनोज कमलिया स्टेडियम में प्रैक्टिस करना शुरू कर दिया. परीक्षाओं के कारण फरवरी 2019 से खेल बंद था लेकिन फिर पिछले एक सप्ताह से हमने प्रैक्टिस शुरु कर दी है. हमारी टीम में करीब 45 लड़कियां हैं.
यहां पहुंची तीसरी टीम थी नारी गुंजन की. पद्मश्री सुधा वर्गीज की देखरेख में चल रही इस संस्था की बच्चियों ने पिछले कुछ दिनों से फुटबॉल खेलना शुरू किया है. बच्चियां इतनी उत्साहित हैं कि कई तो अब इसमें ही करियर बनाना चाहती हैं. फुटबॉल उन्हें आजादी का एहसास करा रहा है. साथ ही जेंडर को लेकर समाज की पुरानी सोच को ये तोड़ रही हैं.
घर से जब पहली बार फुटबॉल खेलने के लिए निकली तो घर से लेकर गांव तक में काफी विरोध झेला. सभी कहते कि लड़की हो कहां फुटबॉल खेलने जाओगी.
काजल कुमारी
मेरे घर वाले तो आसानी से मान गये लेकिन गांव में लोग तरह- तरह की बातें करते थे. लोगों को पसंद नहीं था कि लड़कियां लड़कों की तरह फुटबॉल खेले.
कोमल कुमारी
मैं जब फुटबॉल खेलने लगी तो गांव के लोग घर पहुंच कर माता-पिता को कहते कि तुम्हारी बेटी बिगड़ गयी है. कई बार तो बात लड़ाई – झगड़े तक पहुंच गयी. लोग ताना मारते कि देखो फुटबॉल खेलने जा रही है.
पूनम कुमारी
मुझे फुटबॉल खेलना अच्छा लगता है, पटना के बाहर भी खेल चुकी हूं. घर का काम कर के मैं फुटबॉल खेलने जाती हूं. मेरे साथ खेलने वाली कई लड़कियों ने समाज के ताने से तंग आकर खेलना छोड़ दिया.
तनु कुमारी
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