Ekadashi 2026: हर साल माघ महीने की एकादशी तिथि को षटतिला एकादशी मनाई जाती है. इस दिन भक्त भगवान विष्णु की आराधना करते हैं और व्रत रखते हैं. जो भक्त पूर्ण व्रत नहीं रख पाते, वे केवल पूजा करते हैं और सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं. शास्त्रों में इस दिन चावल खाना वर्जित माना गया है. ऐसे में यह सवाल उठता है कि ऐसा क्या कारण है, जिसकी वजह से इस दिन चावल ग्रहण करने से रोका जाता है. आइए पौराणिक कथा के माध्यम से इसके पीछे के कारण को विस्तार से समझते हैं.
पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, महर्षि मेधा महान तपस्वी और विद्वान थे. एक बार माता शक्ति उग्र रूप में उनके सामने प्रकट हुईं. माता का तेज और क्रोध महर्षि मेधा सहन नहीं कर पाए और उन्होंने अपने शरीर का त्याग कर दिया. बाद में उनके शरीर के अंश पृथ्वी में समा गए.जिस स्थान पर महर्षि मेधा के शरीर के अंश समाए थे, वहां समय बीतने के साथ चावल (धान) और जौ उत्पन्न होने लगे. इसी कारण धार्मिक मान्यताओं में चावल और जौ को सजीव (जीव स्वरूप) माना गया है.
कथा के अनुसार, जिस दिन महर्षि मेधा का शरीर पृथ्वी में समाया था, वह दिन एकादशी तिथि का था. इसी वजह से एकादशी के दिन चावल खाना वर्जित माना गया है. कहा जाता है कि एकादशी के दिन चावल खाना महर्षि मेधा के मांस और रक्त के सेवन के समान है. इसी कारण वैष्णव परंपरा में एकादशी व्रत के दौरान चावल और उससे बने पदार्थों का त्याग किया जाता है.
कुछ पुराणों में यह मान्यता भी मिलती है कि जो व्यक्ति एकादशी के दिन चावल का सेवन करता है, उसे अगले जन्म में रेंगने वाले जीव की योनि प्राप्त होती है. साथ ही ऐसा करने से व्यक्ति के संचित पुण्य नष्ट हो जाते हैं और उसे अशुभ फल की प्राप्ति होती है. इसी कारण एकादशी के दिन लोग फलाहार, कुट्टू, सिंघाड़ा, साबूदाना आदि का सेवन करते हैं और चावल से दूरी बनाए रखते हैं.
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी केवल मान्यताओं और परंपरागत जानकारियों पर आधारित है. प्रभात खबर किसी भी तरह की मान्यता या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है.

