शनि जयंती 2026: कैसे बने शनिदेव ब्रह्मांड के न्यायाधीश? जानें जन्म की पौराणिक कथा
Published by : Neha Kumari Updated At : 16 May 2026 8:04 AM
शनि जयंती 2026
Shani Jayanti 2026: शास्त्रों के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि के दिन माता छाया और सूर्यदेव के पुत्र शनिदेव का जन्म हुआ था. इसी उपलक्ष्य में हर वर्ष इस दिन श्रद्धा और धूमधाम के साथ शनिदेव की पूजा-अर्चना की जाती है.
Shani Jayanti 2026: आज 16 मई को शनि जयंती का पावन पर्व बेहद श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है. इस वर्ष की शनि जयंती अत्यंत विशेष और दुर्लभ संयोग लेकर आई है, क्योंकि आज ज्येष्ठ मास की अमावस्या के साथ-साथ शनिवार का दिन भी है, जिससे ‘शनिचरी अमावस्या’ का महासंयोग बन रहा है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन तिथि को सूर्यपुत्र और न्याय के देवता भगवान शनिदेव का जन्म हुआ था. शास्त्रों में शनिदेव को क्रूर नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष ‘न्यायाधीश’ और ‘कर्मफलदाता’ माना गया है, जो मनुष्य को उसके अच्छे-बुरे कर्मों के अनुसार फल देते हैं. आइए इस विशेष अवसर पर जानते हैं स्कंद पुराण और ब्रह्म पुराण में वर्णित शनिदेव के जन्म की कथा.
पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, शनिदेव भगवान सूर्य और उनकी पत्नी छाया के पुत्र हैं. इस कथा की शुरुआत सूर्यदेव की पहली पत्नी संज्ञा से होती है.
संज्ञा का त्याग और ‘छाया’ का निर्माण
भगवान सूर्य की पत्नी संज्ञा सूर्यदेव के अत्यंत तीव्र तेज और गर्मी को सहन नहीं कर पाती थीं. सूर्यदेव का तेज सहन करने का कोई उपाय न पाकर संज्ञा ने एक कठोर निर्णय लिया. उन्होंने अपने तप से अपने ही जैसी दिखने वाली एक प्रतिरूप (हमशक्ल) को प्रकट किया, जिसका नाम ‘छाया’ (सवर्णा) रखा गया. संज्ञा ने छाया को अपनी अनुपस्थिति में अपने बच्चों की देखभाल करने और सूर्यदेव की सेवा करने की जिम्मेदारी सौंपी और स्वयं तपस्या करने के लिए वन चली गईं. सूर्यदेव इस रहस्य से पूरी तरह अनजान थे.
माता छाया की तपस्या और शनिदेव का श्याम वर्ण
कुछ समय पश्चात माता छाया गर्भवती हुईं. जब शनिदेव माता छाया के गर्भ में थे, तब छाया ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए धूप, गर्मी और भूख-प्यास की परवाह किए बिना कठोर तपस्या की. कहा जाता है कि कठोर तप, तीव्र धूप और योग-अनुष्ठान के प्रभाव के कारण गर्भ में पल रहे शिशु का रंग अत्यंत श्याम (काला) हो गया.
जब ज्येष्ठ मास की अमावस्या को शनिदेव का जन्म हुआ, तब सूर्यदेव ने नवजात शिशु के गहरे श्याम वर्ण को देखकर आश्चर्य और क्रोध व्यक्त किया. उन्होंने संदेह जताते हुए कहा कि इतना श्याम वर्ण वाला बालक उनका पुत्र नहीं हो सकता. सूर्यदेव ने माता छाया का अपमान किया.
माता के इस अपमान और पिता के अविश्वास को देखकर बाल शनिदेव अत्यंत क्रोधित हो गए. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब क्रोधित शनिदेव ने पहली बार अपने पिता सूर्यदेव पर दृष्टि डाली, तो उनकी दृष्टि के प्रभाव से सूर्यदेव का तेज क्षण भर में क्षीण हो गया और उनका शरीर काला पड़ गया. सूर्यदेव के रथ के घोड़े भी स्थिर हो गए.
महादेव ने दिया ‘न्यायाधीश’ का पद
ब्रह्मांड में मचे इस हाहाकार के बीच स्वयं भगवान शिव प्रकट हुए. महादेव ने सूर्यदेव को माता छाया की कठिन तपस्या और पवित्रता के बारे में बताया, जिससे उनका भ्रम दूर हुआ. सत्य जानने के बाद सूर्यदेव को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने शनिदेव को अपने पुत्र के रूप में स्वीकार कर लिया.
शनिदेव की कठोर भक्ति और न्यायप्रिय स्वभाव से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें नवग्रहों में सर्वोच्च स्थान दिया और ब्रह्मांड का दंडाधिकारी (न्यायाधीश) नियुक्त किया. महादेव ने उन्हें वरदान दिया कि वे न केवल मनुष्यों, बल्कि देवी-देवताओं और असुरों को भी उनके कर्मों के आधार पर न्याय और दंड देंगे.
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