Pradosh Vrat: प्रदोष व्रत क्यों रखा जाता है? जानें इसकी पौराणिक कथा और महत्व
Published by : Neha Kumari Updated At : 27 Jan 2026 9:27 AM
प्रदोष व्रत कथा
Pradosh Vrat: भगवान शिव के भक्तों के लिए प्रदोष व्रत का दिन बेहद खास होता है. भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए भक्त इस दिन व्रत रखते हैं और उनकी उपासना करते हैं. आज हम एक पौराणिक कथा के माध्यम से जानेंगे कि यह व्रत क्यों किया जाता है और इसकी शुरुआत कैसे हुई.
Pradosh Vrat: प्रदोष व्रत हिंदू धर्म का एक विशेष पर्व है. यह व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है. मान्यता है कि इस व्रत को करने से भक्त को रोग-कष्ट और दुख-दर्द से मुक्ति मिलती है. साथ ही वैवाहिक जीवन में मधुरता बनी रहती है और जीवन में सकारात्मकता आती है. ऐसे में प्रदोष व्रत से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें से एक कथा के बारे में हम इस लेख में बात करेंगे.
पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, चंद्रदेव का विवाह दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं (नक्षत्रों) से हुआ था. इन सभी में चंद्रदेव को रोहिणी सबसे अधिक प्रिय थीं. चंद्रदेव का रोहिणी के प्रति अधिक प्रेम देखकर अन्य कन्याएं दुखी हो गईं और उन्होंने अपने पिता दक्ष से इसकी शिकायत की.
दक्ष प्रजापति का श्राप
दक्ष प्रजापति स्वभाव से क्रोधी थे. उन्होंने क्रोध में आकर चंद्रदेव को श्राप दे दिया कि वे क्षय रोग से पीड़ित हो जाएंगे. श्राप के प्रभाव से चंद्रदेव धीरे-धीरे रोगग्रस्त होने लगे और उनकी कलाएं क्षीण होती चली गईं. उनकी स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई.
चंद्रदेव ने की भगवान शिव की पूजा
तब नारद मुनि ने चंद्रदेव को भगवान शिव की आराधना करने की सलाह दी. चंद्रदेव ने पूर्ण श्रद्धा के साथ भगवान शिव की पूजा की. जब चंद्रदेव लगभग मृत्यु की अवस्था में पहुंच गए, तब प्रदोष काल में भगवान शिव प्रकट हुए और उन्हें पुनर्जीवन का वरदान दिया. भगवान शिव ने चंद्रदेव को अपने मस्तक पर धारण कर लिया. इस प्रकार चंद्रदेव मृत्यु के समीप पहुंचकर भी मृत्यु से बच गए. बाद में वे धीरे-धीरे स्वस्थ हुए और पूर्णिमा के दिन पूर्ण चंद्र के रूप में प्रकट हुए.
चूंकि भगवान शिव प्रदोष काल के समय चंद्रदेव के सामने प्रकट हुए और उनके रोग (दोष) का निवारण किया था, इसलिए इस व्रत को प्रदोष व्रत कहा जाता है.
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