Manokamna Prayer: अधिकांश लोगों को लगता है कि पूजा-पाठ न करने से ईश्वर नाराज हो जाएंगे, लेकिन सच यह है कि हमारी अधिकतर पूजा सच्चे समर्पण से नहीं होती. वह दिखावे, परंपरा और सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति तक सीमित रहती है. हम ईश्वर को तब याद करते हैं, जब हमें कुछ चाहिए होता है. बड़े-बड़े यज्ञ, अनुष्ठान और व्रत भी कई बार केवल कामना पूर्ति के साधन बन जाते हैं, जिन्हें शास्त्रों में “इष्ट कार्य” कहा गया है.
ईश्वर सौदेबाजी नहीं, कर्म को मानता है
ईश्वर किसी की खुशामद से प्रभावित नहीं होता. उसने सृष्टि के जो नियम बनाए हैं, वे सभी पर समान रूप से लागू होते हैं. कर्म करो और उसी के अनुसार फल भोगो—यह नियम अटल है. ईश्वर पूजा से अधिक कर्म की सच्चाई देखता है.
जब भक्ति बन जाती है सौदा
अक्सर लोग परंपरा, भय, विश्वास या स्वार्थ के कारण पूजा करते हैं. उदाहरण के तौर पर, साल भर पढ़ाई न करने के बाद परीक्षा से पहले मंदिर जाकर कहना— “हे भगवान, पास करा दो, सवा किलो लड्डू चढ़ाऊंगा.”ल यह भक्ति नहीं, सीधी सौदेबाजी है. ऐसे में पास या फेल होना प्रार्थना से नहीं, बल्कि उत्तर पुस्तिका में लिखे कर्मों से तय होता है.
आस्तिक और नास्तिक—दोनों के लिए एक ही नियम
जो व्यक्ति ईश्वर को नहीं मानता, लेकिन अपने कर्म और आत्मविश्वास पर भरोसा रखता है, उसे भी कर्मफल सिद्धांत के अनुसार फल मिलता है. उसी प्रकार पूजा करने वाले व्यक्ति को भी उसके कर्मों के अनुसार ही परिणाम मिलता है—
“अवश्यमेव भोक्तव्यं कर्मफल शुभाशुभम.”
क्या ईश्वर विनती नहीं सुनता?
ईश्वर आर्त भाव से की गई प्रार्थना सुनता है, लेकिन उसके लिए गहरी आस्था और अटूट विश्वास चाहिए. केवल शब्दों की प्रार्थना या चढ़ावे से कर्मफल नहीं बदलता. कई बार ईश्वर पहले भक्त की परीक्षा लेते हैं. ऐसी सच्ची निष्ठा बहुत दुर्लभ होती है.
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पूजा भी कर्म है, विकल्प भी
मीमांसा दर्शन के अनुसार मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है. पूजा करना या न करना भी एक कर्म है. लेकिन फल तो कर्म-विपाक के अनुसार ही मिलेगा. यदि ईश्वर में विश्वास आत्मबल बढ़ाता है, तो उसका लाभ अवश्य है. लेकिन कठिन समय में जब न ईश्वर पर भरोसा हो और न स्वयं पर, तब दिखावटी पूजा किसी काम नहीं आती.
सच्ची भक्ति क्या है?
कर्मकांड से परे, सच्ची भक्ति प्रेम, श्रद्धा और सेवा भावना है. वह स्वार्थ से मुक्त होती है. जैसा कहा गया है— “दुःख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय.” यहां सुख में सुमिरन का अर्थ दिखावटी स्मरण नहीं, बल्कि निरंतर प्रेमपूर्ण स्मरण है.
धर्म का असली स्वरूप
सच्ची भक्ति व्यक्ति को दूसरों के दुःख से जोड़ती है. वह परहित को ही धर्म मानता है. तुलसीदास जी ने कहा है— “परहित सरिस धरम नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई.” ऐसी भावना वाला व्यक्ति बिना कर्मकांड जाने भी ईश्वर के संरक्षण का अधिकारी बन जाता है. वह हर क्षण ईश्वर से जुड़ा रहता है.
डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और लोक विश्वासों पर आधारित है.

