कालाष्टमी 2026: भगवान शिव ने क्यों धारण किया था काल भैरव का स्वरूप, जानें रहस्य

Updated at : 09 Feb 2026 12:14 PM (IST)
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Bhagwan Shiv and kaal Bhairav

भगवान शिव (दाईं तरफ) और कालभैरव (बाईं तरफ)

Kalashtami 2026: आज, 9 फरवरी 2026 को मासिक कालाष्टमी है. इस दिन महादेव के कालभैरव अवतार की पूजा की जाती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि शांति और ध्यान में लीन रहने वाले महादेव ने कालभैरव का यह भयावह रूप क्यों धारण किया? आइए, एक पौराणिक कथा के माध्यम से जानते हैं इसके पीछे छिपा रहस्य.

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Kalashtami 2026: भगवान शिव के अनेक स्वरूप हैं, जिनमें काल भैरव को उनका सबसे रौद्र और शक्तिशाली अवतार माना जाता है. भगवान काल भैरव की कृपा प्राप्त करने के लिए हर माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को ‘कालाष्टमी’ मनाया जाता है. माना जाता है कि काल भैरव की आराधना से भय, बाधा और नकारात्मकता से मुक्ति मिलती है.

कालभैरव अवतार के पीछे का रहस्य

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा और पालनकर्ता भगवान विष्णु के बीच इस बात को लेकर विवाद छिड़ गया कि ब्रह्मांड में सबसे श्रेष्ठ कौन है. विवाद इतना बढ़ा कि समाधान के लिए स्वयं महादेव को हस्तक्षेप करना पड़ा. भगवान शिव एक अनंत प्रकाश स्तंभ यानी ज्योतिर्लिंग के रूप में दोनों के सामने प्रकट हुए, जिसका न आदि था और न ही अंत.

इस अनंत ज्योतिर्लिंग को देखकर भगवान विष्णु बोले, “यदि मैं इस ज्योतिर्लिंग की जड़ तक पहुँच गया, तो मैं सबसे श्रेष्ठ हूँ.” वहीं ब्रह्मा बोले, “यदि मैं इसकी ऊँचाई को छू पाया, तो मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ.” भगवान विष्णु वाराह रूप लेकर पाताल की ओर गए और ब्रह्मा जी हंस रूप में आकाश की ओर उड़ गए. विष्णु जी ने सत्य स्वीकार किया कि उन्हें अंत नहीं मिला.

ब्रह्मा जी ने किया छल

ब्रह्मा जी ने छल का सहारा लिया. ब्रह्मा जी को ऊपर जाते हुए रास्ते में केतकी का फूल मिला, जो कि भगवान शिव पर अर्पित था. ब्रह्मा जी ने केतकी के फूल को गवाह बनाने को कहा कि उन्होंने इस ज्योतिर्लिंग का अंत देख लिया है. केतकी के फूल ने ब्रह्मा जी की बात मान ली. ब्रह्मा जी केतकी के फूल को लेकर वापस विष्णु जी के पास गए और बोले कि उन्होंने ज्योतिर्लिंग का अंत देख लिया है और केतकी के फूल में उनका साथ मिला. सत्य के प्रतीक महादेव से भला क्या छिप सकता था? ब्रह्मा जी के इस असत्य और अहंकार को देखकर महादेव अत्यंत क्रोधित हो उठे.

नाखून से काटा ब्रह्मा जी सिर

उसी क्षण शिव की दोनों भौहों के मध्य से एक भीषण तेज पुंज प्रकट हुआ, जिसने ‘कालभैरव’ का रूप धारण किया. इनका तेज इतना प्रचंड था कि संपूर्ण देवलोक कांप उठा. भगवान कालभैरव ने अपने नाखून से ब्रह्मा जी के उस पांचवें सिर को काट दिया, जिसने असत्य वचन कहा था.

उसी क्षण शिव की दोनों भौहों के मध्य से एक भीषण तेज पुंज प्रकट हुआ, जिसने ‘कालभैरव’ का रूप धारण किया. इनका तेज इतना प्रचंड था कि संपूर्ण देवलोक कांप उठा. भगवान कालभैरव ने अपने नाखून से ब्रह्मा जी के उस पांचवें सिर को काट दिया, जिसने असत्य वचन कहा था.

ब्रह्म हत्या का पाप

ब्रह्मा जी का सिर काटने के कारण कालभैरव पर ब्रह्महत्या का पाप लगा. प्रायश्चित के लिए वे कपाल (ब्रह्मा जी का सिर) हाथ में लेकर तीनों लोकों में भिक्षाटन करते रहे. कथा के अनुसार, जब वे पवित्र नगरी काशी पहुंचे, तो उनके हाथ से वह कपाल गिर गया. जिस स्थान पर यह घटना हुई, उसे आज ‘कपाल मोचन’ तीर्थ के नाम से जाना जाता है.

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी केवल मान्यताओं और परंपरागत जानकारियों पर आधारित है. प्रभात खबर किसी भी तरह की मान्यता या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है.

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Neha Kumari

लेखक के बारे में

By Neha Kumari

प्रभात खबर डिजिटल के जरिए मैंने पत्रकारिता की दुनिया में अपना पहला कदम रखा है. यहां मैं धर्म और राशिफल बीट पर बतौर जूनियर कंटेंट राइटर के तौर पर काम कर रही हूं. इसके अलावा मुझे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से जुड़े विषयों पर लिखने में रुचि है.

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