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देवी आराधना का फलवती केंद्र है त्रिगर्त तीर्थ

Updated at : 21 Oct 2023 3:02 PM (IST)
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देवी आराधना का फलवती केंद्र है त्रिगर्त तीर्थ

धार्मिक मान्यतानुसार, भगवान शिव जब सती के जले हुए शरीर को लेकर आकाश मंडल में व्याकुल होकर घूम रहे थे, तो माता सती के शरीर के टुकड़े देश के विभिन्न हिस्सों में गिरे थे.

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डॉ राकेश कुमार सिन्हा ‘रवि’

अध्यात्म लेखक, गया

युग-युगांतर से धर्म सम्मत रहे भारत देश में शक्ति आराधन का महापुण्य काल नवरात्र की महिमा सर्वत्र बनी हुई है. इस नवरात्रि की पवित्र पुनीत अवधि में देवी भगवती के रूप, स्वरूप, चरित्र, यश:कृति व महिमा के गुणगान के साथ देवी तीर्थ का दर्शन बड़ा ही महत्वकारी होता है. ऐसे में देवी के त्रिगर्त क्षेत्र की चर्चा आवश्यक जान पड़ती है. धार्मिक मान्यतानुसार, भगवान शिव जब सती के जले हुए शरीर को लेकर आकाश मंडल में व्याकुल होकर घूम रहे थे, तो माता सती के शरीर के टुकड़े देश के विभिन्न हिस्सों में गिरे थे. इन स्थानों को शक्तिपीठों के रूप में जाना जाता है.

देवी आराधना में इन शक्तिपीठों का विशेष महत्व है और इनकी संख्या हमें भिन्न-भिन्न रूपों में मिलती है. श्रीमद्देवी भागवत में जहां 108 शक्तिपीठों का उल्लेख है, वहीं देवी पुराण और तंत्र चूड़ामणि जैसे प्रसिद्ध देवी विषयक साहित्य में 51 शक्तिपीठ के विवरण अंकित हैं. त्रिपुरा रहस्य में द्वादश प्रधान देवी तीर्थ की चर्चा है, तो देवी गीता में 72 शक्तिपीठों का क्रमवार वर्णन दिया गया है.

संपूर्ण देश के कण-कण में विराजमान मातृ शक्ति की आराधना का पुराण प्रसिद्ध त्रिगर्त तीर्थ क्षेत्र- ज्वाला देवी, मंगला गौरी और कामाख्या भवानी के साथ सूत्र संबंध है, जो क्रमश: देश के कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश), गया (बिहार) और गुवाहाटी (असम प्रांत) में अवस्थित हैं. वर्तमान स्थान स्थिति, भौगोलिक विवरण व दैहिक स्थिति से तीनों के बीच अक्षुण्ण संबंध स्पष्ट परिबोध होता है. इनमें मां कामाख्या उत्पत्ति कर्ता, मां मंगला गौरी पालन कर्ता और माता ज्वाला देवी की गणना संहार कर्ता के रूप में की जाती है.

त्रिगर्त क्षेत्र की ये देवियां महाविद्या की शक्ति देश-दुनिया के साथ हर एक जीव को जीवन द्रव्य प्रदान कर रही हैं. यही कारण है कि देवी भगवती का यह क्षेत्र देवी साधकों के लिए परम पावन व आराध्यकारी है. ध्यान देने की बात है कि आज भले ही नये युग में राजमार्ग के मार्ग परिवर्तन और भौगोलिक उथल-पुथल के कारण थोड़ी स्थिति विपरीत हुई है, नहीं तो तीनों का समान दूरी पर अवस्थित होना महात्रिगर्त रूप स्पष्ट करता है. यह जानकारी की बात है कि कलयुग में जागृत देवी तीर्थ के रूप में प्रतिस्थापित माता विंध्यवासिनी के धाम में जिस प्रकार महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का स्थान त्रिगर्त का निर्माण करता है, ठीक उसी प्रकार यह त्रिगर्त जम्मू द्वीप के धार्मिक क्षितिज में युगों से महत्वकारी बना हुआ है.

नवरात्र विशेष

मां मंगला गौरी : गया, बिहार

(यहां देवी सती का स्तन मंडल भस्मकूट पर्वत पर गिरा और पंच पयोधन शिलाखंड बन गये. मान्यता है कि जो मनुष्य यहां दर्शन करता है, वो अमरत्व को प्राप्त करता है.)

मां कामख्या : गुवाहाटी, असम

(मान्यतानुसार, यहां मां की योनि मंडल गिरी थी. मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं है. प्रतीक रूप में मां की पूजा होती है.)

मां ज्वाला देवी : कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश

(मान्यतानुसार, इसी स्थान पर माता सती की जीभ गिरी थी. महामाया की पूजा ज्योति के रूप में होती है.)

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