श्रीरामचरितमानस के कुछ चौपाईयों को सिद्ध कर जीवन में कठिनाईयों को दूर किया जाता है. हनुमान जी से संबंधित मानस की कई चौपाईयां है जिनको सिद्ध कर प्रेत बाधा और अन्य रोगों से मुक्ति पाया जा सकता है. मानस सिद्ध मंत्र का यह विधान है कि पहले रात को 10 बजे के बाद अष्टांग हवन के द्वारा मंत्र सिद्ध करना चाहिए. फिर जिस-जिस कार्य के लिए मंत्र जाप की आवश्यकता हो, उसके लिए नित्य जप करना चाहिए. वाराणसी में भगवान शंकर ने मानस की चौपाईयों को मंत्र शक्ति प्रदान की है, इसलिए वाराणसी की ओर मुख करके ही बैठना चाहिए. शंकरजी को साक्षी बनाकर शपथ करने की आवश्यकता है.
मस्तिष्क की पीड़ा दूर करने के लिए
हनुमान अंगद रन गाजे। हांक सुनत रजनीचर भाजे।।
भूत को भगाने के लिए
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानघन।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर।।
मुकदमे में विजय प्राप्ति के लिए
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना।।
श्रीहनुमानजी की प्रसन्नता प्राप्ति के लिए
सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू।।
अकाल मृत्यु निवारण के लिये
नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहि बाट।।
यात्रा सफ़ल होने के लिये
प्रबिसि नगर कीजै सब काजा। ह्रदय राखि कोसलपुर राजा।।
ऐसे करें सिद्ध
जिस उद्देश्य कर पुर्ति के लिए जिस चौपाई या सोरठे का जप बतलाया गया है, उसको सिद्ध करने के लिए एक दिन अष्टांग हवन की सामग्री से उसी चौपाई या सोरठे से 108 बार हवन करना चाहिए. यह हवन केवल एक ही दिन करना है. इसके लिए साधारण सुद्ध मिट्टी की वेदी बनाकर उसपर अग्नि प्रज्ज्वलित करके आहुति देनी चाहिए. प्रत्येक आहुती के बाद स्वाहा बोलना आवश्यक है. यह हवन रात को 10 बजे के बाद ही करना उपयुक्त है. प्रत्येक आहुती करीब पौने तोले का होना चाहिए. इस प्रकार 108 आहुतियों के लिए एक सेर की सामग्री तैयार कर लें. हवन करते समय माला रखने की आवश्यकता केवल गिनती के लिए है.
माला रखने में परेशानी हो तो गेंहू, जौ या चावल के 108 दनें रखें और प्रत्येक आहुती के बाद एक दाने को अलग कर गिनती करें. बैठने के लिए आसन उन अथवा कुश का होना चाहिए. लंकाकांड की चौपाई या दोहे के लिए शनिवार को हवन करें. दूसरे कांड की चौपाई या दोहे के लिए किसी भी दिन हवन किया जा सकता है. दूसरे कार्य के लिए दूसरे दोहे या चौपाई को अलग हवन कर सिद्ध करना होगा. एक दिन हवन करने के बाद मंत्र सिद्ध हो जाता है. इसके बाद जब तक कार्य सिद्ध ना हो तबतक प्रत्येक दिन 108 बार सुबह या रात को जप करना चाहिए.

