द्वैत को ऐक्य करता है प्रेम

Published at :03 Feb 2016 6:23 AM (IST)
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द्वैत को ऐक्य करता है प्रेम

हम अपनो से प्रेम करते हैं. जिसे हम अपना नहीं मानते, उससे प्रेम करना बहुत मुश्किल होता है. उससे दोस्ती भले ही हो सकती है, लेकिन उस प्रकार का प्रेम हम नहीं कर पायेंगे, जैसा प्रेम हम अपनों से करते हैं. हमारे गुरुजी कहते हें कि वही व्यक्ति अपने जीवन को सुधार सकता है, जो […]

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हम अपनो से प्रेम करते हैं. जिसे हम अपना नहीं मानते, उससे प्रेम करना बहुत मुश्किल होता है. उससे दोस्ती भले ही हो सकती है, लेकिन उस प्रकार का प्रेम हम नहीं कर पायेंगे, जैसा प्रेम हम अपनों से करते हैं. हमारे गुरुजी कहते हें कि वही व्यक्ति अपने जीवन को सुधार सकता है, जो दूसरों के दुखों को समझता है. जो दूसरों के दुखों के प्रति संवेदनशील है और दूसरों को दुखों से मुक्त करने के लिए प्रयासरत है, वही व्यक्ति अपने जीवन को प्रगति के पथ पर आगे ले जा सकता है और अपने भीतर ईश्वर का अनुभव कर सकता है.

जब ईश्वर का अनुभव होने लगता है, तब प्रेम का होना स्वाभाविक है, क्योंकि हर व्यक्ति को अंत में ईश्वर से प्रेम होता है. अपने ईश्वर को चाहे किसी भी रूप में देखो, पर अंत में वह स्वरूप सृष्टि के हर कण में दिखाई देता है और वह तुम्हें सृष्टि से, ईश्वर से, सभी प्राणियों से जोड़ देता है और समस्त संसार तुम्हारे लिए तुम्हारा कुटुम्ब हो जाता है. वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना प्रेम की शक्ति है. प्रेम द्वैत को मिटा सकता है, दो को जोड़ सकता है. प्रेम में तुम दूसरों के प्रति संवेदनशील हो जाते हो और दूसरों के दुखों को जान कर अपनी क्षमता के अनुसार उनकी सहायता करते हो.

– स्वामी निरंजनानंद सरस्वती

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