प्रकृति के कर्म

Published at :02 Feb 2016 6:14 AM (IST)
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प्रकृति के कर्म

जो मानव, युग चेतना से जुड़ कर सत्ययोगी तथा आत्मज्ञानी होकर दृष्टा बन हर घटना को सृष्टि के संपूर्णता वाले विधान से जोड़ कर देखता है, वह ही यह रहस्य जान पाता है. अब सबको अग्नि-परीक्षा से गुजरना ही होगा-आंतरिक बीमारियां, अग्नियां ऐसी कि कोई विज्ञान पकड़ न पाये. बाह्य अग्नियां, प्राकृतिक प्रकोप, भूचाल, दुर्घटनाएं, […]

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जो मानव, युग चेतना से जुड़ कर सत्ययोगी तथा आत्मज्ञानी होकर दृष्टा बन हर घटना को सृष्टि के संपूर्णता वाले विधान से जोड़ कर देखता है, वह ही यह रहस्य जान पाता है. अब सबको अग्नि-परीक्षा से गुजरना ही होगा-आंतरिक बीमारियां, अग्नियां ऐसी कि कोई विज्ञान पकड़ न पाये. बाह्य अग्नियां, प्राकृतिक प्रकोप, भूचाल, दुर्घटनाएं, दावानल आदि. मनुष्य को यह सत्य एक क्षण को भी नहीं भुलना है कि हम सब यहां केवल माध्यम हैं.
कुछ जीकर सृष्टि का उत्थान क्रम व कर्म चलाते हैं, कुछ मर कर. शरीर का हनन होता है, ऊर्जा व विचार का नहीं. कोई भी ऊंचा-नीचा, छोटा-बड़ा, महान या तुच्छ नहीं. शैतानियत के भी माध्यम हैं और दिव्यता के भी. दोनों ही शक्तियां प्रकृति के नियमों में ही निबद्ध हैं.
प्रकाश के लिए निगेटिव और पॉजिटिव दोनों ही करंट चाहिए. तुझे अपनी सच्चाई जान कर, विवेक जगा कर यह जानना ही होगा कि तू किस शक्ति में संलग्न है. अपनी प्रकृति को संवारना है. पूर्णता तक ले जाना है. प्रकृति के कर्म में दुविधा या संशय नहीं होता. बस होना ही होता है. जिसे अज्ञानवश लोग होनी या प्रारब्ध कह देते हैं. अब भविष्य का सत्य-समय आ ही पहुंचा है.
– मीना ओम्
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