स्वबोध का संज्ञान

Updated at :19 Jun 2015 5:18 AM
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स्वबोध का संज्ञान

हमारे जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या है? इस तमाम अस्त-व्यस्तता का, युद्ध का, राष्ट्रों के बीच संघर्ष एवं कलह का अर्थ क्या है?-इन सबको जानने से पहले अपने आपको जानना जरूरी है. यह बड़ा सरल प्रतीत होता है, लेकिन है यह अत्यंत दुष्कर. यह देखने के लिए कि हमारे भीतर विचार-प्रक्रिया कैसे काम करती है, […]

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हमारे जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या है? इस तमाम अस्त-व्यस्तता का, युद्ध का, राष्ट्रों के बीच संघर्ष एवं कलह का अर्थ क्या है?-इन सबको जानने से पहले अपने आपको जानना जरूरी है. यह बड़ा सरल प्रतीत होता है, लेकिन है यह अत्यंत दुष्कर. यह देखने के लिए कि हमारे भीतर विचार-प्रक्रिया कैसे काम करती है, व्यक्ति को असाधारण रूप से सतर्क होना होगा.

व्यक्ति जैसे-जैसे अपने सोच-विचार, प्रत्युत्तरों एवं भावों की जटिलता के प्रति अधिक सतर्क होता जायेगा, वैसे-वैसे उसकी सजगता केवल अपने प्रति ही नहीं, अपने से जुड़े हुए लोगों के प्रति भी बढ़ती जायेगी. अपने को जानने का अर्थ है क्रिया-कलाप के दौरान अपना अध्ययन करना, और यही संबंध है. कठिनाई यह है कि हम इतने अधीर हैं कि हम बस आगे बढ़ जाना चाहते हैं,

हम किसी लक्ष्य को हासिल कर लेना चाहते हैं और इसलिए हमारे पास अध्ययन के लिए न तो समय है और न ही अवसर. हमने विविध गतिविधियों की-जीविकोपार्जन की-जिम्मेवारी ले ली है अथवा विभिन्न संगठनों के दायित्वों को अपने ऊपर ओढ़ लिया है. तमाम तरह की जिम्मेवारियों का ऐसा बोझ हमने सिर पर रख लिया है कि सोचने-विचारने के लिए, निरीक्षण के लिए, अध्ययन के लिए हमें समय ही नहीं मिलता. इसलिए जितना अधिक आप अपने को जानेंगे, उतनी ही अधिक स्पष्टता होगी.

जे कृष्णमूर्ति

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