संन्यास का जन्म

अगर आप अपने चौबीस घंटे के जीवन को देखें, तो आप पायेंगे कि उसमें सब प्रतिकर्म हो रहे हैं. कोई कुछ कर रहा है, आप उसके उत्तर में कुछ कर रहे हैं. मैं आपसे पूछूं कि आप ऐसा भी कुछ कर रहे हैं क्या, जो किसी का उत्तर नहीं है? कोई काम आप ऐसा भी […]
अगर आप अपने चौबीस घंटे के जीवन को देखें, तो आप पायेंगे कि उसमें सब प्रतिकर्म हो रहे हैं. कोई कुछ कर रहा है, आप उसके उत्तर में कुछ कर रहे हैं. मैं आपसे पूछूं कि आप ऐसा भी कुछ कर रहे हैं क्या, जो किसी का उत्तर नहीं है? कोई काम आप ऐसा भी कर रहे हैं क्या, जो किसी का उत्तर नहीं है?
जो किसी का उत्तर न हो, जो किसी के कारण रिएक्शन में पैदा न हुआ हो, जो प्रतिक्रिया न हो, वह कर्म है. और वह कर्म ही साधना है. इसको जरा विचार करेंगे, तो आप देखेंगे कि आप चौबीस घंटे प्रतिकर्म कर रहे हैं. दूसरे कुछ कर रहे हैं, उनके उत्तर में आप कुछ कर रहे हैं. आपने कुछ किया है अभी तक, जो सिर्फ आपने किया हो? जो आपसे पैदा हुआ और आपसे आया हो? उसे थोड़ा देखें. और उसे साधें, तो ठीक परिवार में और घर में और संसार के बीच संन्यास फलित हो जाये. संसार का विरोध संन्यास नहीं है, संसार की शुद्धि संन्यास है. अगर संसार में आप शुद्ध होते चले जायें, एक दिन आप पायेंगे कि आप संन्यासी हो गये हैं. संन्यासी होना कोई वेश-परिवर्तन नहीं है कि हमने कपड़े बदल लिये और हम संन्यासी हो गये. संन्यास तो पूरे अंतस का परिवर्तन है, एक विकास है.
संन्यास एक ग्रोथ है. बड़े आहिस्ता, बहुत आहिस्ता एक विकास है. अगर कोई व्यक्ति ठीक से अपने जीवन का उपयोग करे, जैसी भी परिस्थितियां हों, उनका उपयोग करें, तो क्रमिक रूप से वह धीरे-धीरे पायेगा कि उसके भीतर संन्यास उभर रहा है. उसमें एक संन्यासी का जन्म हो रहा है.
आचार्य रजनीश ‘ओशो’
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