व्यावहारिक भक्तियोग

सामन्यत: जब हमें इच्छित वस्तु मिल जाती है, तो हम अत्यंत प्रसन्न होते हैं और जब अनिच्छित घटना घटती है, तो दुखी होते हैं. लेकिन यदि हम वास्तविक आध्यात्मिक स्थिति को प्राप्त हों, तो ये बातें हमें विचलित नहीं कर पायेंगी. इस स्थिति तक पहुंचने के लिए हमें अटूट भक्ति का अभ्यास करना होता है. […]
सामन्यत: जब हमें इच्छित वस्तु मिल जाती है, तो हम अत्यंत प्रसन्न होते हैं और जब अनिच्छित घटना घटती है, तो दुखी होते हैं. लेकिन यदि हम वास्तविक आध्यात्मिक स्थिति को प्राप्त हों, तो ये बातें हमें विचलित नहीं कर पायेंगी. इस स्थिति तक पहुंचने के लिए हमें अटूट भक्ति का अभ्यास करना होता है.
विपथ हुए बिना कृष्णभक्ति का अर्थ होता है भक्ति की नवविधियों कीर्तन, श्रवण, पूजन आदि में प्रवृत्त होना. यह स्वाभाविक है कि आध्यात्मिक जीवन शैली का अभ्यस्त हो जाने पर मनुष्य भौतिकवादी लोगों से मिलना नहीं चाहेगा. उससे उसे हानि पहुंच सकती है. मनुष्य को चाहिए कि वह यह परीक्षा करके देख ले कि वह अवांछित संगति के बिना एकांतवास करने में कहां तक सक्षम है. यह स्वाभाविक ही है कि भक्त में व्यर्थ ही समय गंवाने की कोई रुचि नहीं होती. कुछ शोधार्थी तथा दार्शनिक ऐसे हैं, जो वासनापूर्ण जीवन का अध्ययन करते हैं, लेकिन भगवद्गीता के अनुसार ऐसा शोध कार्य और दार्शनिक चिंतन निर्थक है. भगवद्गीता के अनुसार मनुष्य को चाहिए कि अपने दार्शनिक विवेक से वह आत्मा की प्रकृति के विषय में शोध करे. उसे चाहिए कि वह अपनी आत्मा को समझने के लिए शोध करे. जहां तक आत्म-साक्षात्कार का संबंध है, यहां स्पष्ट है कि भक्तियोग ही व्यावहारिक है. ज्यों ही भक्ति की बात उठे, मनुष्य को चाहिए कि परमात्मा तथा आत्मा के संबंध पर विचार करे. आत्मा तथा परमात्मा कभी एक नहीं हो सकते. अत: भक्ति नित्य है.
स्वामी प्रभुपाद
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