अचिंत्य चिंतन का दुष्प्रभाव

Updated at :28 Oct 2014 7:07 AM
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अचिंत्य चिंतन का दुष्प्रभाव

अधिकांश मामलों में देखा जाता है कि व्यक्ति की बायोलॉजिकल एज (कायिक आयु) उसकी क्रोनोलॉजिकल एज (मियादी आयु) से बढ़ी-चढ़ी होती है. आखिर बुढ़ापा असमय क्यों आ धमकता है? इन सभी बातों के सूक्ष्म अध्ययन के लिए जरा विज्ञान अथवा जेरानटोलॉजी की शाखा की शुरुआत की गयी है, जिसमें वैज्ञानिक इस बात की खोज करते […]

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अधिकांश मामलों में देखा जाता है कि व्यक्ति की बायोलॉजिकल एज (कायिक आयु) उसकी क्रोनोलॉजिकल एज (मियादी आयु) से बढ़ी-चढ़ी होती है. आखिर बुढ़ापा असमय क्यों आ धमकता है? इन सभी बातों के सूक्ष्म अध्ययन के लिए जरा विज्ञान अथवा जेरानटोलॉजी की शाखा की शुरुआत की गयी है, जिसमें वैज्ञानिक इस बात की खोज करते हैं कि क्या इस स्थिति को कुछ काल तक टाला जा सकता है? किंतु ऐसा तभी संभव है, जब वैज्ञानिक इसके कारणों का पता लगा सकें.

कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि शरीर में जल्दी ही अशक्तता के लक्षण प्रकट होने का कारण शरीर की कोशिकाओं में होनेवाली म्यूटेशन की प्रक्रिया है. म्यूटेशन से प्रभावित कोशिकाएं अपनी जैसी कोशिकाओं को जन्म देने लगती हैं. फलत: शरीर में विपरीत लक्षण प्रकट होने लगते हैं. वैज्ञानिकों के एक बड़े समूह का विचार है कि ऐसा व्यक्ति के रहन-सहन, चिंतन-मनन एवं पर्यावरण प्रभाव के कारण होता है. उनके अनुसार अचिंत्य चिंतन का दुष्प्रभाव आरंभ में तंत्रिका कोशाओं पर पड़ता है और बाद में अन्य कोशिकाएं प्रभावित होती चली जाती हैं.

योग तथा आयुर्वेद के प्राचीन आचार्यों ने पूर्व से ही इसके लिए योग और आयुर्वेद के अवलंबन का परामर्श दिया है. अब वैज्ञानिक निष्कर्ष भी वहीं आ पहुंचा है. अब वे भी योग आसन, ध्यान धारणा की सलाह दे रहे हैं. वैज्ञानिकों ने अनेक प्रयोग परीक्षण भी किये, जिनके परिणाम काफी उत्साहवर्धक आये हैं.

।। पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ।।

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