नौवां दिन : महागौरी दुर्गा का.....
Author :Prabhat Khabar Digital Desk
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Updated at :02 Oct 2014 6:02 AM
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इस तरह ऐं ह्रीं क्लीं तीनों बीज मिलाने पर अर्थ होगा – महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती नामक तीन मूर्तियोंवाले. ‘चामुण्डायै’ ‘चा=चित्, ‘मु’= मूर्त सद्रूप, ‘ण्डा’ (न्दा) आनंदरूप, ‘चामुण्डायै’- अर्थात सत्-चित्-आनंदरूपा चामुण्डा देवी को ‘विच्चे’ – विद्= विद्म: अर्थात जानते हैं, च = चिन्तयाम: – अर्थात चिन्तन करें. पूरे मंत्र का भावार्थ यह निकलता है कि ‘हम […]
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इस तरह ऐं ह्रीं क्लीं तीनों बीज मिलाने पर अर्थ होगा – महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती नामक तीन मूर्तियोंवाले. ‘चामुण्डायै’ ‘चा=चित्, ‘मु’= मूर्त सद्रूप, ‘ण्डा’ (न्दा) आनंदरूप, ‘चामुण्डायै’- अर्थात सत्-चित्-आनंदरूपा चामुण्डा देवी को ‘विच्चे’ – विद्= विद्म: अर्थात जानते हैं, च = चिन्तयाम: – अर्थात चिन्तन करें.
पूरे मंत्र का भावार्थ यह निकलता है कि ‘हम महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वतीनामक तीन मूर्तियों से विशिष्य तथा सत्-चित् आनंदात्मक ब्रह्मस्वरूप आद्या योगमाया को प्राप्त करने के लिए पूजा एवं ध्यान द्वाराउसे जानत9 हैं. इसी से स्पष्ट हो जाता है कि यह शक्ति परब्रह्मत्मिका ही है. अत: आप ‘ब्रह्म’ नाम से उसकी उपासना करें या ‘शक्ति’ नाम से दोनों में कोई अंतर नहीं.
इन्येषा वामयी पूजा देवीचरण पदमयो:।
अर्पिता तेन मे माता प्रीयतां पुत्रवत्सला।।
नौवां दिन
सिद्धिदायनी दुर्गा का ध्यान
सिद्ध गन्धर्वयक्षाधैर सुरैमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।
सिद्धों, गंधवों, यक्षों, असुरों और देवों द्वारा भी सदा सेवित होनेवाली सिद्धिदायिनी दुर्गा सिद्धिप्रदान करनेवाली हों.
नवरात्र व्रत एवं आद्याशक्ति श्रीदुर्गा उपासना-नौ
नवरात्र के अवसर पर जो आद्याशक्ति दुर्गा की उपासना किया जाता है यही भगवती शक्ति ही जगत का पालन कर रही है. वह धर्मात्माओं के घर में साक्षात लक्ष्मी है. धर्माधर्म का परिचय ज्ञान बिना नहीं हो सकता. समर्थ ही ज्ञानी हो सकता है. जो दुर्बल, जिसका इंद्रियों पर अधिकार नहीं है, जो प्राकृतिक आघात-प्रत्याघातों से विचलित हो जाता है, उसको ज्ञान क्या होगा? अर्थाथ सामर्थ्य से संपन्न ज्ञानपूर्वक धन अजिर्त करनेवाले मनुष्यों के घर संपत्ति, पुत्र, स्त्री, पशु, वैभव और लक्ष्मी से कभी खाली नहीं हो सकते. इसी प्रकार पापियों के घर में वह भगवती दरिद्रता के रूप में, शुद्धान्त: करणवाले पुरुषों के हृदयों में बुद्धिरूप से सत्पुरुषों में श्रद्धारूप से और कुलीनों में लज्जारूप से निवास करती है.
्रभारत के विभिन्न अंचलों के लक्ष-लक्ष-नर-नारी, बालक-बालिका मां दुर्गा के आगमन पर नवरात्र के अवसर पर आनंद-विभोर हो उठते हैं. शास्त्र, योग-विधियों, साधनों से अनभिज्ञ कोटि-कोटि ग्रामीणजन नवरात्रों तथा दुर्गापूजा में सम्मिलित होकरतन्मयतापूर्वक यत्किंचित पत्र, पुष्प, ध्वजा, नारियल अर्पित कर अभीप्सित फल प्राप्त करते हैं. कुछ सुरथ जैसे राज्यकामी उपासक सार्वार्ण मनु हो जाते हैं तथा अन्य समाधि-जैसे वैश्य आराधक ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं. मान्यता है कि नवरात्र के अवसर पर जो भी मनुष्य तन-मन से मां दुर्गा की उपासना करता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. इस समय सभी स्त्रियों को देवी मान कर उनका सम्मान करना, काम-क्रध-मद-मोह प्रभृत्ति आंतरिक तथा ब्राrा अनाचारों एवं दोषों को छोड़ना मां दुर्गा के उपासना के लिए अनिवार्य एवं अति उपयोगी है.
(समाप्त)
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