पाश महज एक पंजाबी कविता नहीं, समूची भारतीय कविता का जरूरी नाम

Author : KumarVishwat Sen Published by : Prabhat Khabar Updated At : 23 Mar 2020 10:50 PM

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पाश न महज पंजाबी कविता, बल्कि समूची भारतीय कविता के लिए एक जरूरी नाम हैं क्योंकि उनके योगदान के उल्लेख के बिना भारतीय साहित्य और समाज के लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं बनता है.

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अमरीक, वरिष्ठ पत्रकार

पाश न महज पंजाबी कविता, बल्कि समूची भारतीय कविता के लिए एक जरूरी नाम हैं क्योंकि उनके योगदान के उल्लेख के बिना भारतीय साहित्य और समाज के लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं बनता है. उनका जीवन और कला दोनों महान हैं. उन्हें क्रांति का कवि कहा जाता है. जिस तरह की जीवनधारा पाश की रही, उसके बीच से फूटनेवाली रचनाशीलता में उनका काम बेजोड़ है क्योंकि उन जैसा सूक्ष्म कलाबोध दुर्लभ है. उनका अपना सौंदर्यशास्त्र है, जो टफ तो है, पर रफ नहीं. वहां गुस्सा, उबाल, नफरत, प्रोटेस्ट और खूंरेजी तो है ही, गूंजें-अनुगूंजें भी हैं. सपाट सच हैं, पर सदा सपाटबयानी नहीं. पाश यकीनन एक प्रतीक हैं और एक शहीद के तौर पर उनके किस्से पीढ़ी-दर-पीढ़ी दिमागों में टंके हुए हैं. जब वह जीवित थे, तब भी, कई अर्थों में दूसरों के लिए ही थे. अदब में आसमां सरीखा कद रखनेवाले पाश धरा के कवि थे.

वे पंजाबी के कवि थे, लेकिन व्यापक हिंदी समाज उन्हें अपना मानता है. तमाम भारतीय भाषाओं में भी उन्हें खूब पढ़ा जाता है, विदेशी भाषाओं में भी. ऐसी जनप्रियता किसी दूसरे पंजाबी लेखक के हिस्से नहीं आयी. हिंदी की बेहद स्तरीय पत्रिका ‘पहल’ ने पूरे एहतराम के साथ उनकी कविताएं तब छापी थीं, जब वे किशोरावस्था व युवावस्था के बीच थे. वरिष्ठ हिंदी के वरिष्ठ कवियों- मंगलेश डबराल, आलोक धन्वा, राजेश जोशी, केदारनाथ सिंह, सौमित्र मोहन, अरुण कमल, ऋतुराज, वीरेन डंगवाल, कुमार विकल, उदय प्रकाश, लीलाधर जगूड़ी, गिरधर राठी आदि पाश की कविता के गहरे प्रशंसकों में शुमार रहे. आलोक धन्वा को हिंदी कविता का अप्रतिम हस्ताक्षर माना जाता है. वे पाश के करीबी दोस्त थे. उनसे मिलने बिहार से पंजाब, पाश के गांव उग्गी (जालंधर) भी आये थे. तब पंजाब में नक्सली लहर का जोर था और उनकी गिरफ्तारी होते-होते बची. प्रख्यात कथाकार अरुण प्रकाश और गीतकार बृजमोहन पाश की हत्या के बाद रखे गए श्रद्धांजलि समागम में शिरकत के लिए विशेष रुप से देश भगत यादगार हाल जालंधर आये थे.

पाश ने 15 साल की किशोरवय उम्र में परिपक्व कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं. उनमें क्रांति की छाप थी, सो उन्हें क्रांतिकारी कवि कहा जाने लगा. पहले-पहल यह खिताब उन्हें महान नुक्कड़ नाटककार गुरशरण सिंह ने दिया था. बीस साल की उम्र में उनका पहला संग्रह ‘लौह कथा’ प्रकाशित हुआ. यह कविता संग्रह आज भी पंजाबी में सबसे ज्यादा बिकनेवाली कविता पुस्तक है. ‘कागज के कातिलों’ के लिए यह मिसाल एक खास सबक होनी चाहिए कि पाश ने अपने तईं अपना कोई भी संग्रह कभी भी किसी ‘स्थापित’ आलोचक को नहीं भेजा. पंजाबी के तमाम आलोचक बहुचर्चा के बाद उनकी कविता का नोटिस लेने को मजबूर हुए. बहुतेरों ने उनकी कविता का लोहा माना और कुछ ने नकारा. प्रशंसा-आलोचना-निंदा से पाश सदा बेपरवाह रहे.

उनकी अध्ययन पद्धति गजब की थी. अपने खेत को खोदकर (बेसमेंट में) उन्होंने अपनी लाइब्रेरी बनायी थी, जहां दुनियाभर की किताबें थीं. नक्सली लहर के दौरान 1969 में जब उन्हें झूठे आरोपों के साथ गिरफ्तार कर जेल भेजा गया, तब इन किताबों के खजाने को पुलिस ने ‘सुबूत’ के बहाने ‘लूट’ लिया. पाश रिहा हुए, लेकिन जब्ती का शिकार बनीं किताबें उन्हें कभी वापिस नहीं मिलीं. पुलिसिया यातना का उन्हें इतना मलाल नहीं रहा, जितना इस बात का. वे खुद पढ़ने के लिए कॉलेज नहीं गये, लेकिन उनका कविता संग्रह एमए में पढ़ाया गया. पाश की एक काव्यपंक्ति बेहद मशहूर है : ‘सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना…!’ उनका मानना था कि पहले बेहतर दुनिया सपनों में आयेगी और फिर यही सपने साकार होंगे, लेकिन जरूरी लड़ाई के साथ! पंजाबी क्या, किसी भी भाषा में कविता का ऐसा सौंदर्यशास्त्रीय मुहावरा दुर्लभ है. इसे ही लिखकर पाश ‘महानता’ की श्रेणी को छू गये.

विचारधारात्मक तौर पर वह हर किस्म की कट्टरता, अंधविश्वास और मूलवाद के खिलाफ थे. पंजाब में फिरकापरस्त आतंकवाद की काली आंधी आयी, तो उन्होंने वैचारिक लेखन भी किया. वे अपना दिमाग और शरीर इसलिए बचाना चाहते थे कि इन तमाम अलामतों का बादलील विरोध कर सकें. उनका मानना था कि अगर मस्तिष्क रहेगा, तो बहुत कुछ संभव होगा. वह दुनिया बनेगी, जिसकी दरकार है बेहतर जीवन के लिए. जीवन पर मंडराते खतरे की वजह से वे विदेश चले गये और अपना अभियान जारी रखा. उन्हें अपना वतन बार-बार खींचता था, सो कुछ दिनों के लिए आ जाते थे. साल 1988 की 23 मार्च को वे अपने गांव में थे कि खालिस्तानी आतंकियों ने घात लगाकर उन्हें कत्ल कर दिया. कातिल नहीं जानते थे कि जिस्म कत्ल होने से फलसफा और लफ्ज कत्ल नहीं होते. तेईस मार्च का दिन शहीद भगत सिंह के लिए भी जाना जाता है और आज पाश के लिए भी. न भगत सिंह मरे और न पाश. पाश ने कविता ‘अब मैं विदा लेता हूं’ में कहा है: ‘मुझे जीने की बहुत चाह थी/ कि मैं गले-गले तक जिंदगी में डूब जाना चाहता था/मेरे हिस्से की जिंदगी भी जी लेना मेरे दोस्त…!’ उनके हिस्से की जिंदगी बहुतेरे लोग जी रहे हैं. कई भारतीय भाषाओं में इस कवि की प्रतिनिधि कविताओं के संग्रह प्रकाशित हैं. हिंदी में सबसे मकबूल संग्रह ‘बीच का रास्ता नहीं होता’ है.

पाश न महज पंजाबी कविता, बल्कि समूची भारतीय कविता के लिए एक जरूरी नाम हैं क्योंकि उनके योगदान के उल्लेख के बिना भारतीय साहित्य और समाज के लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं बनता है. उनका जीवन और कला दोनों महान हैं. उन्हें क्रांति का कवि कहा जाता है. जिस तरह की जीवनधारा पाश की रही, उसके बीच से फूटनेवाली रचनाशीलता में उनका काम बेजोड़ है क्योंकि उन जैसा सूक्ष्म कलाबोध दुर्लभ है. उनका अपना सौंदर्यशास्त्र है, जो टफ तो है, पर रफ नहीं. वहां गुस्सा, उबाल, नफरत, प्रोटेस्ट और खूंरेजी तो है ही, गूंजें-अनुगूंजें भी हैं. सपाट सच हैं, पर सदा सपाटबयानी नहीं. पाश यकीनन एक प्रतीक हैं और एक शहीद के तौर पर उनके किस्से पीढ़ी-दर-पीढ़ी दिमागों में टंके हुए हैं. जब वह जीवित थे, तब भी, कई अर्थों में दूसरों के लिए ही थे. अदब में आसमां सरीखा कद रखनेवाले पाश धरा के कवि थे.

वे पंजाबी के कवि थे, लेकिन व्यापक हिंदी समाज उन्हें अपना मानता है. तमाम भारतीय भाषाओं में भी उन्हें खूब पढ़ा जाता है, विदेशी भाषाओं में भी. ऐसी जनप्रियता किसी दूसरे पंजाबी लेखक के हिस्से नहीं आयी. हिंदी की बेहद स्तरीय पत्रिका ‘पहल’ ने पूरे एहतराम के साथ उनकी कविताएं तब छापी थीं, जब वे किशोरावस्था व युवावस्था के बीच थे. वरिष्ठ हिंदी के वरिष्ठ कवियों- मंगलेश डबराल, आलोक धन्वा, राजेश जोशी, केदारनाथ सिंह, सौमित्र मोहन, अरुण कमल, ऋतुराज, वीरेन डंगवाल, कुमार विकल, उदय प्रकाश, लीलाधर जगूड़ी, गिरधर राठी आदि पाश की कविता के गहरे प्रशंसकों में शुमार रहे. आलोक धन्वा को हिंदी कविता का अप्रतिम हस्ताक्षर माना जाता है. वे पाश के करीबी दोस्त थे. उनसे मिलने बिहार से पंजाब, पाश के गांव उग्गी (जालंधर) भी आये थे. तब पंजाब में नक्सली लहर का जोर था और उनकी गिरफ्तारी होते-होते बची. प्रख्यात कथाकार अरुण प्रकाश और गीतकार बृजमोहन पाश की हत्या के बाद रखे गए श्रद्धांजलि समागम में शिरकत के लिए विशेष रुप से देश भगत यादगार हाल जालंधर आये थे.

पाश ने 15 साल की किशोरवय उम्र में परिपक्व कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं. उनमें क्रांति की छाप थी, सो उन्हें क्रांतिकारी कवि कहा जाने लगा. पहले-पहल यह खिताब उन्हें महान नुक्कड़ नाटककार गुरशरण सिंह ने दिया था. बीस साल की उम्र में उनका पहला संग्रह ‘लौह कथा’ प्रकाशित हुआ. यह कविता संग्रह आज भी पंजाबी में सबसे ज्यादा बिकनेवाली कविता पुस्तक है. ‘कागज के कातिलों’ के लिए यह मिसाल एक खास सबक होनी चाहिए कि पाश ने अपने तईं अपना कोई भी संग्रह कभी भी किसी ‘स्थापित’ आलोचक को नहीं भेजा. पंजाबी के तमाम आलोचक बहुचर्चा के बाद उनकी कविता का नोटिस लेने को मजबूर हुए. बहुतेरों ने उनकी कविता का लोहा माना और कुछ ने नकारा. प्रशंसा-आलोचना-निंदा से पाश सदा बेपरवाह रहे.

उनकी अध्ययन पद्धति गजब की थी. अपने खेत को खोदकर (बेसमेंट में) उन्होंने अपनी लाइब्रेरी बनायी थी, जहां दुनियाभर की किताबें थीं. नक्सली लहर के दौरान 1969 में जब उन्हें झूठे आरोपों के साथ गिरफ्तार कर जेल भेजा गया, तब इन किताबों के खजाने को पुलिस ने ‘सुबूत’ के बहाने ‘लूट’ लिया. पाश रिहा हुए, लेकिन जब्ती का शिकार बनीं किताबें उन्हें कभी वापिस नहीं मिलीं. पुलिसिया यातना का उन्हें इतना मलाल नहीं रहा, जितना इस बात का. वे खुद पढ़ने के लिए कॉलेज नहीं गये, लेकिन उनका कविता संग्रह एमए में पढ़ाया गया. पाश की एक काव्यपंक्ति बेहद मशहूर है : ‘सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना…!’ उनका मानना था कि पहले बेहतर दुनिया सपनों में आयेगी और फिर यही सपने साकार होंगे, लेकिन जरूरी लड़ाई के साथ! पंजाबी क्या, किसी भी भाषा में कविता का ऐसा सौंदर्यशास्त्रीय मुहावरा दुर्लभ है. इसे ही लिखकर पाश ‘महानता’ की श्रेणी को छू गये.

विचारधारात्मक तौर पर वह हर किस्म की कट्टरता, अंधविश्वास और मूलवाद के खिलाफ थे. पंजाब में फिरकापरस्त आतंकवाद की काली आंधी आयी, तो उन्होंने वैचारिक लेखन भी किया. वे अपना दिमाग और शरीर इसलिए बचाना चाहते थे कि इन तमाम अलामतों का बादलील विरोध कर सकें. उनका मानना था कि अगर मस्तिष्क रहेगा, तो बहुत कुछ संभव होगा. वह दुनिया बनेगी, जिसकी दरकार है बेहतर जीवन के लिए. जीवन पर मंडराते खतरे की वजह से वे विदेश चले गये और अपना अभियान जारी रखा. उन्हें अपना वतन बार-बार खींचता था, सो कुछ दिनों के लिए आ जाते थे. साल 1988 की 23 मार्च को वे अपने गांव में थे कि खालिस्तानी आतंकियों ने घात लगाकर उन्हें कत्ल कर दिया. कातिल नहीं जानते थे कि जिस्म कत्ल होने से फलसफा और लफ्ज कत्ल नहीं होते. तेईस मार्च का दिन शहीद भगत सिंह के लिए भी जाना जाता है और आज पाश के लिए भी. न भगत सिंह मरे और न पाश. पाश ने कविता ‘अब मैं विदा लेता हूं’ में कहा है: ‘मुझे जीने की बहुत चाह थी/ कि मैं गले-गले तक जिंदगी में डूब जाना चाहता था/मेरे हिस्से की जिंदगी भी जी लेना मेरे दोस्त…!’ उनके हिस्से की जिंदगी बहुतेरे लोग जी रहे हैं. कई भारतीय भाषाओं में इस कवि की प्रतिनिधि कविताओं के संग्रह प्रकाशित हैं. हिंदी में सबसे मकबूल संग्रह ‘बीच का रास्ता नहीं होता’ है.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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